रात के ग्यारह बज चुके थे। देवदार के घने जंगलों से घिरे उस पहाड़ी कॉटेज की खिड़की पर बर्फ की हल्की परत जमने लगी थी। बाहर की हाड़ कंपा देने वाली ठंड और भीतर की सुलगती हुई खामोशी के बीच सिर्फ एक ही आवाज गूंज रही थी—कमरे के कोने में रखे हीटर की हल्की सी सनसनाहट और हम दोनों की सांसों की धीमी गति। अवनि खिड़की के पास खड़ी थी। उसने गहरे कत्थई रंग का ऊनी शॉल अपने कंधों पर लपेट रखा था, लेकिन उसके पैर नंगे थे। पहाड़ी हवा जब-जुदा कांच के पैनल से टकराती, एक कपकपी उसके पूरे वजूद से होकर गुजर जाती। मैं कुछ दूरी पर बैठा सिर्फ उसे देख रहा था। हमारे बीच कोई फिल्मी संवाद नहीं था, कोई जल्दबाजी नहीं थी। बस एक भारी, गाढ़ा सन्नाटा था जिसमें दोनों का तनाव साफ महसूस हो रहा था। "ठंड बढ़ रही है," उसने मुड़े बिना कहा। उसकी आवाज में पहाड़ की उस रात जैसी ही एक हल्की सी थरथराहट थी। मैं अपनी जगह से उठा। मेरे पैर लकड़ी के फर्श पर बिना कोई आवाज किए पड़े। मैं उसके ठीक पीछे जाकर रुक गया। हमारी बॉडी केमिस्ट्री में एक अजीब सा खिंचाव था, जो पिछले दो दिनों की यात्रा में धीरे-धीरे पक रहा था। जब मैं उसके करीब खड़ा ह...