पहाड़ों की ढलान पर बना वह छोटा सा दो कमरों का सरकारी गेस्ट हाउस बाहर की मूसलाधार बारिश और भूस्खलन के भयानक शोर से लगातार थरथरा रहा था। बाहर रास्ता पूरी तरह बंद हो चुका था , पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा ढह जाने के कारण बिजली के सारे खंभे उखड़ चुके थे। कूपेनुमा कमरे में सिर्फ़ एक पुरानी मोमबत्ती की मद्धम , पीली और काँपती हुई लौ जल रही थी , जिसकी परछाइयाँ सीलन भरी दीवारों पर नाच रही थीं। ऑफ़िस में रोहन और नेहा का रिश्ता हमेशा बेहद पेशेवर रहा था — रोहन एक सख्त सीनियर प्रोजेक्ट लीड था और नेहा अपनी शर्तों पर काम करने वाली सीनियर एनालिस्ट। लेकिन इस अचानक आई प्राकृतिक आपदा , कड़ाके की ठंड और बाहर मंडराती मौत के इस सन्नाटे ने दोनों के बीच के सारे औपचारिक पर्दे एक झटके में फाड़ दिए थे। कमरे में ठंड इतनी भयानक थी कि दोनों एक ही भारी कंबल के नीचे सिमटे हुए थे। मोमबत्ती की रोशनी में नेहा की पसीने और ठंड से भीगी त्वचा चमक रही थी। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। " रोहन... बाहर का रास्ता शायद कल तक भी न खुले ," नेहा ने अपनी काँपती हुई आवाज़ में कहा। उसकी गर्म साँसें रोहन की ठुड्डी ...