पहाड़ों की
ढलान पर बना वह छोटा सा दो कमरों का सरकारी गेस्ट हाउस बाहर की मूसलाधार बारिश और
भूस्खलन के भयानक शोर से लगातार थरथरा रहा था। बाहर रास्ता पूरी तरह बंद हो चुका
था, पहाड़ का एक
बड़ा हिस्सा ढह जाने के कारण बिजली के सारे खंभे उखड़ चुके थे। कूपेनुमा कमरे में
सिर्फ़ एक पुरानी मोमबत्ती की मद्धम, पीली और काँपती हुई लौ जल रही थी, जिसकी परछाइयाँ सीलन भरी दीवारों
पर नाच रही थीं।
ऑफ़िस में
रोहन और नेहा का रिश्ता हमेशा बेहद पेशेवर रहा था—रोहन एक सख्त सीनियर प्रोजेक्ट लीड था और नेहा अपनी
शर्तों पर काम करने वाली सीनियर एनालिस्ट। लेकिन इस अचानक आई प्राकृतिक आपदा, कड़ाके की ठंड और बाहर मंडराती मौत
के इस सन्नाटे ने दोनों के बीच के सारे औपचारिक पर्दे एक झटके में फाड़ दिए थे।
कमरे में
ठंड इतनी भयानक थी कि दोनों एक ही भारी कंबल के नीचे सिमटे हुए थे। मोमबत्ती की
रोशनी में नेहा की पसीने और ठंड से भीगी त्वचा चमक रही थी। उसकी छाती तेज़ी से
ऊपर-नीचे हो रही थी।
"रोहन...
बाहर का रास्ता शायद कल तक भी न खुले," नेहा ने अपनी काँपती हुई आवाज़ में कहा। उसकी गर्म
साँसें रोहन की ठुड्डी से टकरा रही थीं। "अगर पहाड़ी का अगला हिस्सा इसी कमरे
पर आ गिरा... तो? हम यहीं
जिंदा दब गए तो?"
"हम नहीं
दबेंगे, नेहा," रोहन ने कंबल के भीतर नेहा की पतली
और बेहद सुलगती हुई कमर पर अपनी गर्म हथेली जमाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक गहरा
ठहराव और भारीपन था। "लेकिन इस मौत के डर को अपने दिमाग से निकालो। इस वक्त
इस दुनिया में, इस बंद कमरे
में सिर्फ़ हम दोनों हैं। कोई डेडलाइन नहीं, कोई क्लाइंट नहीं।"
"तुम्हारा यह
हाथ..." नेहा ने अपनी आँखें मूँद लीं। रोहन की चौड़ी हथेली उसकी कमर से सरकती
हुई उसकी पसलियों और फिर उसकी ढीली हो चुकी शर्ट के निचले बटनों पर पहुँच चुकी थी।
"तुम्हारी उँगलियाँ इतनी गर्म क्यों हैं, रोहन? बाहर तो शून्य से नीचे का तापमान है।"
"क्योंकि
तुम्हारी यह कँपकँपी सिर्फ़ ठंड से नहीं है, नेहा," रोहन ने एक-एक करके उसकी शर्ट के बटन खोलना शुरू
किया। उसकी उँगलियों का स्पर्श इतना धीमा और घर्षण से भरा था कि हर एक बटन के
खुलने के साथ नेहा की रीढ़ की हड्डी में बिजली की लहर दौड़ जाती थी। "तुम
दफ़्तर में हमेशा अपनी भावनाओं और अपनी देह को इस फॉर्मल सूट के पीछे दबाकर रखती
हो। आज इस आपदा ने तुम्हें मेरे सामने पूरी तरह उघाड़ दिया है।"
"रोहन...
प्लीज," नेहा के
मुँह से एक लंबी, थरथराती हुई
सिसकी निकली। उसकी नग्न छाती ठंड और उत्तेजना के मिले-जुले अहसास से तेज़ी से
ऊपर-नीचे हो रही थी। उसके कड़े हो चुके निप्पल रोहन के सीने के बालों से धीरे-धीरे
रगड़ खा रहे थे। "मुझसे यह धीमी छुअन बर्दाश्त नहीं हो रही। तुम्हारे हाथ...
बहुत बेबाक हो रहे हैं। यह दफ़्तर का रोहन तो बिल्कुल नहीं है।"
"अभी बेबाकी
कहाँ देखी है तुम?" रोहन ने
उसके होंठों के ठीक ऊपर रुककर बेहद धीमी आवाज़ में फुसफुसाया। उसकी एक हथेली ने
नेहा की पैंट का हुक खोला और ज़िप को धीरे से नीचे खिसकाया। "बताओ मुझे, क्या दफ़्तर की सबसे काबिल और
दिमाग़दार एनालिस्ट के पास इस वक्त मेरी इस हरकत का कोई विश्लेषण है? कोई डेटा है तुम्हारे पास?"
"कोई... कोई
विश्लेषण नहीं है," नेहा ने
अपने होंठों को दाँतों के बीच इतनी ज़ोर से भींच लिया कि वे लाल हो गए। रोहन की
गर्म हथेली अब उसकी पैंट के अंदर दाखिल होकर उसकी जाँघों के बीच की नमकीन, अत्यधिक गीली और सुलगती हुई गर्मी
पर पहुँच चुकी थी। "वहाँ सिर्फ़ अपनी उँगलियाँ मत रखो, रोहन... मुझे और गहराई तक महसूस
कराओ। मुझे तड़पाओ मत।"
"इतनी उतावली
क्यों हो रही हो?" रोहन ने
अपनी दो उँगलियों को उस गीलेपन पर बहुत ही आहिस्ता, गोल-गोल दायरे में रगड़ा। उसकी गति इतनी धीमी थी जैसे
कूपे के भीतर समय रुक गया हो। "बाहर तूफ़ान है, नेहा। हम जल्दी में कहाँ जाएँगे? न कोई ट्रेन पकड़नी है, न कोई मीटिंग है। इस एक-एक
मिलीमीटर के घर्षण को अपने रोएँ-रोएँ में महसूस करो।"
"तुम... तुम
जानबूझकर मुझे तड़पा रहे हो," नेहा ने
अपनी जाँघों को रोहन की कमर के चारों तरफ़ कसने की कोशिश की, ताकि घर्षण की गति बढ़े, लेकिन रोहन ने अपने भारी जिस्म का
थोड़ा सा भार उस पर डालकर उसे पलंग पर पूरी तरह स्थिर कर दिया। "मेरी जाँघों
के बीच आग लगी है, रोहन...
क्या तुम्हें मेरी यह प्राकृतिक नमी महसूस नहीं हो रही? मैं पूरी भीग चुकी हूँ।"
"सब महसूस हो
रहा है," रोहन ने
अपनी पैंट को पूरी तरह से अलग किया। उसने अपने अत्यधिक सख्त, कड़े, मोटे और भारी अंग के अग्रभाग को
नेहा की सुलगती हुई, संकरी और
गीली दीवारों के ठीक मुहाने पर लाकर टिका दिया। लेकिन उसने अपनी कमर को एक
मिलीमीटर भी आगे नहीं बढ़ाया। वह केवल उस मुहाने पर जमा रहा।
"रोहन!"
नेहा के मुँह से एक तीखी, दर्दीली
कराह निकली। उस मामूली से स्पर्श और फिर रुक जाने के अहसास ने उसके पूरे तंत्रिका
तंत्र को बेबस कर दिया था। "यह क्या बदतमीज़ी है? रुकना बंद करो! अपनी यह कठोरता
मेरे अंदर उतारो... मुझे इस तरह आधा-अधूरा मत छोड़ो।"
"मुझे
साफ़-साफ़ शब्दों में बताओ, नेहा," रोहन ने उसकी आँखों में अपनी गहरी
आँखों से सीधे देखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में अब कोई औपचारिकता या शराफत नहीं बची
थी, केवल एक
नग्न और भारी पुरुषार्थ का अधिकार था। "अपनी इस कॉर्पोरेट शराफत और भाषा को
चूल्हे में डालो। मुझे बिल्कुल नग्न शब्दों में बताओ कि तुम्हें इस वक्त मुझसे
क्या चाहिए।"
नेहा ने
अपनी आँखें भींच लीं। लाज, संकोच और
मर्यादा का आखिरी छिलका भी उस ठंडे, अँधेरे कमरे में मोमबत्ती की लौ के साथ जलकर राख हो
चुका था। उसकी साँसें इतनी तेज़ थीं कि उसकी छाती रोहन के सीने से बुरी तरह टकरा
रही थी।
"मैं... मैं
मिन्नत करती हूँ, रोहन!"
नेहा ने हांफते हुए, सिसकियों और
कराहों के बीच चीखकर कहा। उसकी आँखों की पुतलियाँ वासना से फैल चुकी थीं।
"अपने को मेरे अंदर डालो... इसे पूरा का पूरा मेरे समुद्र की गहराई तक घोंप
दो! मैं अंदर से जल रही हूँ, रोहन...
मुझे अपनी पूरी ताकत से रौद डालो!"
उन खुले, नग्न और तीखे शब्दों को सुनते ही
रोहन ने एक गहरी साँस ली। उसके चेहरे पर एक वहशी और कठोर संतुष्टि तैर गई। उसने
नेहा की दोनों कलाइयों को उसके सिर के ऊपर ले जाकर बिस्तर पर कसकर दबा दिया। लेकिन
इसके बावजूद उसने अपनी गति में कोई तेज़ी नहीं लाई।
बेहद धीमी, भारी, सख्त और रगड़ भरी रफ़्तार से रोहन
ने खुद को इंच-दर-इंच उसके भीतर उतारना शुरू किया। हर एक मिलीमीटर का प्रवेश इतना
धीमा था कि नेहा को उसके अंग के हर एक उभार और नस का घर्षण अपनी अंदरूनी दीवारों
पर महसूस हो रहा था।
"आहहहह! उफ़्फ़...
रोहन! माँ!"
जैसे ही
रोहन का कठोर अंग नेहा की संकरी और अत्यधिक गर्म दीवारों को चीरता हुआ अंदर घुसा, नेहा के मुँह से एक ऐसी चीख निकली
जो कमरे की दीवारों से टकराकर बाहर के तूफ़ान में कहीं खो गई। उसकी आँखों से सुख
के आँसू छलक पड़े।
"कैसा लग रहा
है, मैडम?" रोहन ने उसके कान के पास झुककर
अपनी भारी आवाज़ में फुसफुसाया। उसकी चाल अभी भी इतनी धीमी थी कि नेहा की रीढ़ की
हड्डी काँप रही थी। "बोलो, क्या दफ़्तर
की किसी बड़ी डील को क्रैक करने में ऐसा सुकून मिलता है?"
"अहह...
नहीं... रोहन... बिल्कुल नहीं..." नेहा का गला पूरी तरह सूख चुका था। उसकी
कमर खुद-ब-खुद रोहन की उस धीमी चाल के साथ ताल मिलाने के लिए ऊपर उठने लगी।
"यह... यह बहुत मोटा और भारी लग रहा है अंदर... बहुत ज़्यादा गर्म है। पर
इतनी धीमी गति क्यों? मुझे
तड़पाना बंद करो... अपनी कमर की पूरी ताकत से मुझे ठोको!"
"धीमी गति
में ही तो असली अहसास छिपा है, नेहा," रोहन ने अपनी कमर को आधा इंच पीछे
खींचा, जिससे वह
गीला और सुलगता घर्षण फिर से जीवित हो उठा, और फिर उतने ही ज़ोर से बेहद आहिस्ता-आहिस्ता खुद को
वापस उसकी गहराई तक दबा दिया। "मैं चाहता हूँ कि बाहर भले ही दुनिया तबाह हो
जाए, लेकिन इस
कमरे के भीतर तुम्हें मेरी मौजूदगी का हर एक कण, मेरी कठोरता का हर एक इंच अपने अंदर हमेशा के लिए
महसूस हो।"
"मुझे...
मुझे सब महसूस हो रहा है," नेहा ने
रोहन के कंधों में अपने नाखून गाड़ दिए, जिससे पसीने से भीगी उसकी पीठ पर लाल निशान बनने लगे।
उसकी जाँघों का दबाव रोहन की कमर पर और कस गया। "तुम्हारी यह धीमी और भारी
रगड़ मेरी पूरी आत्मा को झकझोर रही है... रोहन, थोड़ा और अंदर... पूरा का पूरा अंदर समा जाओ!"
"मैं पूरा
अंदर ही हूँ," रोहन ने
अपनी कमर को बिल्कुल निचले हिस्से तक सटा दिया। दोनों के पसीने से लथपथ जिस्म
एक-दूसरे से पूरी तरह चिपक चुके थे। बाहर हवा का बवंडर खिड़कियों के शीशों को बजा
रहा था, लेकिन अंदर
कमरे में सिर्फ़ दो शरीरों की धीमी, भारी, घर्षण से भरी और कामुक टकराने की आवाज़ें गूँज रही
थीं।
"अब अपनी
रफ़्तार को थोड़ा बढ़ाओ ना... प्लीज," नेहा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। उसकी साँसें उखड़ रही
थीं और उसका निचला हिस्सा बेकाबू होकर काँप रहा था। "ऐसे रुक-रुक कर घर्षण मत
करो... मुझे जान से मार डालोगे तुम। मुझे चरम तक पहुँचा दो।"
"मौत का डर
तो बाहर पहाड़ी पर था, नेहा," रोहन ने उसके होंठों पर अपने होंठ
रखे और एक गहरा, रसीला और
नमकीन चुंबन लेते हुए बेहद धीमी गति से अपनी कमर को आगे-पीछे करना जारी रखा।
"यहाँ अंदर तो सिर्फ़ ज़िंदगी है... और तुम्हारा यह सुलगता हुआ नग्न जिस्म, जो मेरी हर एक धीमी चाल पर थरथरा
रहा है।"
"हाँ... मैं
थरथरा रही हूँ," नेहा ने चुंबन
के बीच ही सिसकते हुए अपने होंठों को उसके होंठों से अलग किया। "तुम्हारे इस
कठोर अंग ने मेरी मर्यादा को अंदर तक फाड़ दिया है... रोहन... मुझे इसी तरह अपने
भीतर महसूस करते रहो।"
रोहन ने
उसकी कलाइयों को छोड़कर उसके दोनों नितंबों को अपने हाथों में कसकर थाम लिया। उसने
अपनी चाल को एक निश्चित, भारी और
घर्षण से भरी रफ़्तार पर बनाए रखा—न बहुत तेज़, न बहुत धीमी, बल्कि इतनी सटीक और आक्रामक कि हर एक धक्के के साथ
नेहा का पूरा वजूद हिल उठता।
"बताओ नेहा," रोहन ने उसकी जाँघों को अपने कंधों
पर थोड़ा और चौड़ा करते हुए कहा, "क्या कल
सुबह जब हम यहाँ से सुरक्षित निकलेंगे, तो दफ़्तर की फ़ाइलों पर साइन करते वक्त तुम्हें यह
रात और मेरी यह रफ्तार याद आएगी?"
"फ़ाइलें...
चूल्हे में गईं फ़ाइलें!" नेहा ने अपनी कमर को थोड़ा ऊपर उठाकर उस भारी धक्के
को अपनी गहराई में और उतार लिया। "कल का किसे पता है, रोहन... इस वक्त मुझे सिर्फ़
तुम्हारा यह सख्त अहसास चाहिए। मुझे ठोको... आहिस्ता ही सही, पर अपनी पूरी ताकत और गहराई से
मुझे भर दो!"
रोहन ने एक
लंबी और भारी साँस ली। मोमबत्ती की पीली रोशनी में दोनों के शरीरों की पसीने से
भीगी त्वचा सोने की तरह चमक रही थी। बाहर की आपदा और मौत के साए के बीच, उस छोटे से कमरे में दो सहकर्मी
धीमी गति के इस आदिम, नग्न और
बेबाक खेल में पूरी तरह लीन थे, जहाँ हर एक
मिलीमीटर का सफ़र प्रेम, वासना और
ज़िंदगी का सबसे सच्चा सच बन चुका था।
रोहन की हर
एक धीमी और घर्षण से भरी चाल ने नेहा के भीतर वासना का ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया था
कि उसका संयम पूरी तरह पिघलकर बह चुका था। कमरे में जलती मोमबत्ती की पीली रोशनी
में दोनों के शरीरों से टपकता पसीना एक अजीब सी चमक पैदा कर रहा था। बाहर तूफ़ानी
हवा गेस्ट हाउस की खिड़कियों को झकझोर रही थी, लेकिन नेहा के भीतर का तूफ़ान बाहर के मौसम से कहीं
ज़्यादा खौफ़नाक था।
नेहा ने
तड़पकर अपने दोनों हाथ रोहन की चौड़ी और पसीने से भीगी पीठ पर फैला दिए। उसके होंठ
रोहन की सुडौल गर्दन, कंधों और
सीने पर बेकाबू होकर रेंगने लगे। उसने रोहन के सीने के बालों के बीच अपने होंठ
टिकाए और वहाँ की सुलगती त्वचा को चूसते हुए एक लंबी सिसकी भरी।
"रोहन...
उफ़्फ़, रोहन..."
नेहा की आवाज़ हर चुंबन के साथ टूट रही थी। उसने अपने होंठों को रोहन की कॉलर बोन
पर दबाया और दाँतों से हल्का सा काटते हुए फुसफुसाया, "तुम्हारा यह चौड़ा सीना... यह
पसीने से भीगी पीठ... सब कुछ मुझे पागल कर रहा है। मेरी गर्दन पर अपने होंठ रखो, रोहन... मुझे अपनी जीभ की गर्मी
महसूस कराओ।"
रोहन ने
अपनी चाल को रोककर अपने होंठ नेहा की गर्दन के संवेदनशील मोड़ पर रख दिए। उसने
वहाँ अपनी जीभ से पसीने की एक बूँद को चाटा और दाँतों से हल्का सा दबाव बनाया।
"आहहह!
रोहन..." नेहा का पूरा शरीर एक झटके से ऐंठ गया। उसने अपनी दोनों टाँगें रोहन
की कमर के चारों तरफ़ और कस लीं। "मेरी गर्दन... मेरी छाती... मेरा एक-एक अंग
सुलग रहा है। देखो मेरी उठी हुई छाती को... ये कड़े हो चुके निप्पल तुम्हारे सीने
से रगड़ खाने के लिए तरस रहे हैं। इन्हें अपने मुँह में लो, रोहन! इन्हें चूसो... मुझे पूरी
तरह से निचोड़ लो!"
रोहन ने
नेहा की माँग को सुनते ही झुककर उसके एक निप्पल को अपने होंठों के बीच दबाया और
जीभ से उसे सहलाते हुए ज़ोर से चूसा।
"उफ़्फ़...
माँ! आहहह!" नेहा ने अपने सिर को पीछे की तरफ़ पटक दिया। उसकी आँखें सुख के
मारे ऊपर की ओर चढ़ गईं। "हाँ... बिल्कुल ऐसे ही... मेरी छाती को अपने दाँतों
से भींचो! और नीचे देखो, रोहन...
मेरी जाँघें... मेरी सुलगती हुई जाँघों के बीच की यह गहराई... । तुम्हारी उँगलियों
और तुम्हारे इस अंग के घर्षण ने मेरी समुद्र की एक-एक दीवार को फाड़ दिया
है!"
रोहन ने
अपने चेहरे को उसकी छाती से ऊपर उठाया। उसकी आँखों में एक भयानक कामुक जुनून और
वहशीपन तैर रहा था।
"बहुत आमंत्रण
दे रही हो, नेहा?" रोहन ने भारी और घर्षण भरी आवाज़
में कहा। "तुम्हारी यह बेबाकी... तुम्हारी यह रसीली भाषा मुझे बेकाबू कर रही
है।"
"तो हो जाओ
बेकाबू!" नेहा ने चीखकर कहा, उसकी जाँघों
के बीच की प्राकृतिक नमी अब दोनों के जिस्मों के टकराव के साथ छपक-छपक की आवाज़
पैदा कर रही थी। "मेरी समुद्र तुम्हें पुकार रही है, रोहन! इसे तरसाना बंद करो। अपने इस
मोटे, सख्त और
सुलगते हुए चप्पू को मेरी समुद्र की सबसे गहरी दीवार तक पहुँचा दो। कोना-कोना तुम्हारे इस अंग को
महसूस करना चाहता है!" नेहा के मुँह से अपने एक-एक अंग का नाम सुनकर और इस
नग्न आमंत्रण को पाकर रोहन के भीतर का संयम एक पल में टूट गया।
अचानक, रोहन ने अपनी गति के ठहराव को पूरी
तरह बदल दिया। उसने अपनी कमर को पीछे खींचा और पूरी ताकत के साथ एक भयानक, तेज़ और बेकाबू धक्का मारा।
"आह्हहहह!
रोहन!" नेहा के मुँह से एक तीखी, चीखने वाली कराह निकली।
समीर/रोहन
की गति अब अचानक इतनी तेज़ हो चुकी थी कि नेहा का पूरा शरीर पलंग पर पीछे की तरफ़
खिसकने लगा। वह तेज़-तेज़ धक्के मारकर उसकी समुद्र की गहराई को लगातार नाप रहा था।
धक्कों की थप-थप की आवाज़ कमरे में गूँजने लगी।
"यह रफ़्तार
कैसी लग रही है, नेहा?" रोहन ने हाँफते हुए, अपनी कमर को बेकाबू रफ़्तार से
चलाते हुए कहा। "बोलो! क्या यही तेज़ी चाहिए थी तुम्हें?"
"हॉं!
आहहह... उफ़्फ़... रोहन! यह... यह बहुत तेज़ है!" नेहा ने चादर को अपने हाथों
में भींच लिया। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे उछल रही थी। "और ज़ोर से... मेरी
समुद्र को पूरी तरह से फाड़ दो... आहहह! बहुत मज़ा आ रहा है!"
लेकिन जैसे
ही नेहा चरम सुख के उस किनारे पर पहुँचने वाली थी, रोहन ने अचानक अपनी रफ़्तार को बिल्कुल धीमा कर दिया।
उसने अपनी कमर की तेज़ी को एकदम से रोककर खुद को बेहद आहिस्ता, इंच-दर-इंच बाहर खींचा और फिर उतनी
ही धीमी, भारी और
रगड़ भरी चाल से अंदर सरकाया।
"अरे...
नहीं! रोहन... यह क्या किया?" नेहा बेबसी
से तड़प उठी। उस अचानक आई धीमी गति ने उसे सुख के उस किनारे पर लटका दिया था।
"धीमे मत हो! फिर से तेज़ करो... प्लीज, मुझे किनारे से वापस मत लाओ!"
"यही तो खेल
है, नेहा," रोहन ने उसके होंठों पर अपने होंठ
रगड़ते हुए बेहद धीमी गति जारी रखी। उसने अपने अंग के अग्रभाग को उसकी अंदरूनी
दीवारों पर धीरे-धीरे घिसा। "कभी यह धीमी, सुलगती हुई यातना... और कभी वह भयानक तूफ़ान। तुम्हें
मेरे इस उतार-चढ़ाव का हर एक अहसास पीना पड़ेगा।"
"तुम... तुम
बहुत बेरहम हो, रोहन!"
नेहा ने रोहन के निचले होंठ को अपने दाँतों में दबाकर ज़ोर से चूसा। "मेरी
गर्दन से लेकर मेरी जाँघों तक... के मुहाने से लेकर मेरी गहराई तक... सब कुछ
तुम्हारा गुलाम बन चुका है। अअपनी कमर को फिर से तेज़ करो!"
रोहन ने
उसके होंठों को गहराई से चूमा और अपनी कमर की रफ़्तार को एक बार फिर से बेकाबू
तूफ़ान में बदल दिया। इस बार धक्कों की तेज़ी और गहराई पहले से भी ज़्यादा खौफ़नाक
थी।
"आअआहहहह!
माँ! रोहन...!" नेहा की चीख मोमबत्ती की लौ को कँपा गई।
रोहन का हर
एक धक्का उसकी समुद्र की सबसे अंदरूनी दीवार से गहराई से टकरा रहा था। नेहा के
मुँह से अब गालियाँ और बेकाबू सिसकियाँ एक साथ निकल रही थीं।
"हाँ, रोहन... ठोको मुझे! ज़ोर से... और
ज़ोर से! मेरी समुद्र को अपने चप्पू की गर्मी से भर दो!" नेहा अपनी कमर को
ऊपर उठाकर रोहन के हर तेज़ धक्के का स्वागत कर रही थी।
रोहन ने कभी
अपनी रफ्तार को एकदम धीमा करके घर्षण की सुलगती यातना दी, तो कभी भयानक तेज़ी से धक्के मारकर
नेहा के वजूद को झकझोर दिया। इस तेज़ और धीमे के खेल ने नेहा की कामुकता को उसके
उच्चतम शिखर पर पहुँचा दिया था।
"रोहन...
मैं... मैं अब नहीं रोक सकती!" नेहा की रीढ़ की हड्डी धनुष की तरह अकड़ गई।
उसकी जाँघें रोहन की कमर पर कस गईं। "मेरा कोना-कोना काँप रहा है... मुझे
पूरा अंदर तक भर दो!"
रोहन ने
अपनी रफ़्तार को चरम तेज़ी पर पहुँचाया और एक आखिरी, भयानक और गहरा धक्का देकर खुद को उसकी गहराई में पूरी
तरह सटा दिया। दोनों जिस्म चरम सुख की उस बेकाबू लहर में एक साथ काँप उठे, और नेहा की एक तीखी चीख कूपे के
सन्नाटे को चीरती हुई बाहर के तूफ़ान में विलीन हो गई।
चरम सुख के
उस बेकाबू झटके के बाद भी रोहन ने खुद को नेहा से अलग नहीं किया। उसका भारी और
कड़ा अंग नेहा की अत्यधिक सुलगती हुई गहराई में पूरी तरह समाया हुआ था। कमरे में
जलती मोमबत्ती की लौ अब छोटी हो चुकी थी, लेकिन उसकी मद्धम पीली रोशनी में दोनों के शरीरों पर जमा
पसीने की बूँदें किसी ओस की तरह चमक रही थीं।
नेहा की
साँसें अभी भी बुरी तरह उखड़ रही थीं। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे होती हुई रोहन
के सीने से बार-बार टकरा रही थी। उसने अपने दोनों हाथों से रोहन के चेहरे को थामा
और उसकी आँखों में झाँका—वहाँ अब
किसी दफ़्तर के बॉस का अनुशासन नहीं था, बल्कि एक प्रेमी का आक्रामक और नग्न समर्पण था।
"तुमने...
तुमने मुझे पूरी तरह निचोड़ दिया, रोहन..."
नेहा ने हाँफते हुए, सिसकी भरी
आवाज़ में कहा। उसकी उँगलियाँ रोहन के गीले बालों में फँसी हुई थीं। "पर
तुम्हारा यह अंग... यह अभी भी मेरे अंदर उसी कठोरता से टिका हुआ है। क्या तुम्हारा
मन अभी भी नहीं भरा?"
"मन?" रोहन के चेहरे पर एक कुटिल और
कामुक मुस्कान आ गई। उसने नेहा के निचले होंठ को अपने दाँतों के बीच हल्का सा
भींचा, "दफ़्तर में
जब तुम मेरी किसी फाइल पर अपनी एनालिटिकल रिपोर्ट देती थी, तो क्या एक ही बार में काम खत्म हो
जाता था? नहीं ना? तो फिर इस रात को इतनी जल्दी खत्म
कैसे होने दूँ?"
"तुम... तुम
बहुत बड़े शैतान हो," नेहा के
मुँह से एक मीठी कराह निकली।
रोहन ने
अपनी कमर को ज़रा सा पीछे खींचा और फिर बेहद धीमी रफ्तार से, इंच-दर-इंच अपनी कमर को घुमाते हुए
एक गोल घर्षण दिया। उस बेहद संकीर्ण और गीली जगह पर हुए उस मामूली से घर्षण ने
नेहा के पूरे तंत्रिका तंत्र में एक बार फिर आग लगा दी।
"आह्हहह!
रोहन..." नेहा का शरीर पलंग पर फिर से अकड़ गया। "नहीं... फिर से वह
धीमी यातना मत शुरू करो! मेरे समुुुद्र अंदर से अभी भी सुलग रही है... तुम्हारा हर
एक छोटा सा झटका मुझे पागल कर रहा है।"
"तो अपनी
जाँघों को थोड़ा और फैलाओ," रोहन ने
ठंडे और अधिकार भरे लहजे में कहा। "अपनी जाँघों को मेरे कंधों पर रखो और मुझे
अपनी गहराई का आखिरी छोर छूने दो।"
नेहा ने
बिना किसी संकोच के अपनी दोनों सुडौल जाँघें रोहन के चौड़े कंधों पर टिका दीं। इस
स्थिति ने रोहन के प्रवेश को और भी ज़्यादा गहरा और आक्रामक बना दिया।
"बताओ मुझे, नेहा," रोहन ने अपनी कमर को बेहद आहिस्ता, पर पूरी ताकत के साथ अंदर दबाते
हुए पूछा, "मेरी इस
कठोरता का अहसास कैसा लग रहा है? क्या दफ़्तर
की किसी फॉर्मल टेबल पर तुमने कभी इस तरह बेबस महसूस किया था?"
"नहीं... कभी
नहीं..." नेहा की आँखें बंद हो गईं, उसके मुँह से राल टपकने लगी थी। "तुम्हारी इस
चाल ने... तुम्हारे इस चप्पू ने मेरी सारी अकड़ निकाल दी है। रोहन... प्लीज, अपनी उँगलियों को मेरी नाभि के
नीचे रखो और अपनी गति को फिर से वही तूफ़ानी रफ्तार दो!"
रोहन ने
अपनी एक हथेली से उसकी कमर को कसा और दूसरी हथेली को उसकी नाभि पर दबाते हुए अचानक
अपनी रफ़्तार को दस गुना तेज़ कर दिया।
"थप... थप...
थप..."
कूपेनुमा
कमरे में दोनों के नग्न शरीरों की भयानक टक्कर की आवाज़ गूँजने लगी। बाहर की
मूसलाधार बारिश और हवा का शोर इस बेकाबू रफ़्तार के सामने फीका पड़ चुका था। रोहन
का हर धक्का नेहा की सुलगती हुई समुद्र की सबसे अंदरूनी दीवार से टकरा रहा था।
"आहहहह!
रोहन! माँ! ज़ोर से... और ज़ोर से ठोको मुझे!" नेहा अब पूरी तरह बेकाबू होकर
चीख रही थी। उसकी छाती पर बने निप्पल रोहन की हर चाल के साथ हवा में उछल रहे थे।
"अपनी पूरी ताकत लगा दो... मुझे पूरी तरह से फाड़ डालो!"
"यह
लो!" रोहन ने हाँफते हुए, अपनी कमर की
रफ़्तार को और आक्रामक बनाते हुए आखिरी धक्के मारे। "सम्भालो अपनी इसAnalyst की प्यास को!"
तेज़ धक्कों
और सुलगते घर्षण के इस मिश्रण ने नेहा को कुछ ही पलों में दोबारा चरम सुख के उस
भयानक बवंडर में धकेल दिया। नेहा की एक तीखी चीख के साथ उसका पूरा शरीर थरथरा उठा, उसकी अंदरूनी मांसपेशियों ने रोहन
के अंग को कसकर भींच लिया। उसी पल रोहन ने भी एक गहरी कराह के साथ अपनी पूरी
गर्माहट उसकी गहराई में उड़ेल दी।
दोनों
हाँफते हुए एक-दूसरे से चिपक कर पलंग पर गिर पड़े। बाहर तूफ़ान थमने का नाम नहीं
ले रहा था, पर अंदर उस
गेस्ट हाउस के छोटे से कमरे में दो जिस्मों की प्यास और वासना का तूफ़ान पूरी तरह
शांत हो चुका था।
गेस्ट हाउस
के उस सीलन भरे कमरे में मोमबत्ती की पीली लौ अब भी थरथरा रही थी, लेकिन बिस्तर पर सत्ता का संतुलन
पूरी तरह पलट चुका था। इस बार रोहन नीचे चित लेटा हुआ था, उसकी दोनों कलाइियाँ पलंग के
सिरहाने से बंधी थीं और नेहा उसके ऊपर सवार थी। ऑफ़िस में रोहन का जो रुतबा, कड़ा अनुशासन और भारी आवाज़ थी, वह सब इस वक्त नेहा की उँगलियों और
उसकी कमर की मद्धम गति के नीचे पिघलकर राख हो चुका था।
नेहा ने
अपनी नग्न छाती को रोहन के सीने से सटाते हुए उसके होंठों पर अपने होंठ रखे और
दाँतों से उसके निचले होंठ को हल्का सा दबाया। रोहन का पूरा शरीर सुलग रहा था, उसकी साँसें बुरी तरह उखड़ रही थीं
और उसका सख्त, भारी अंग
नेहा की अत्यधिक सुलगती और गीली दीवारों के मुहाने पर अटका हुआ था।
"नेहा...
प्लीज..." रोहन के मुँह से एक गहरी, भारी सिसकी निकली। उसकी कमर खुद-ब-खुद ऊपर उठकर
प्रवेश करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन नेहा
ने अपनी हथेलियों को उसके सीने पर जमाकर उसे पूरी तरह वहीं रोक रखा था। "इस
तरह लटका कर मत रखो... मुझे अपने अंदर जाने दो।"
नेहा के
चेहरे पर एक कुटिल और बेहद कामुक मुस्कान आई। उसने अपनी कमर को एक मिलीमीटर भी
नीचे नहीं झुकाया, बल्कि रोहन
की आँखों में आँखें डालकर बेहद शांत आवाज़ में कहा, "इतनी उतावली किस बात की है, रोहन? दफ़्तर में तो तुम हर काम में 'प्रोसेस' और 'धीमी चाल' की दुहाई देते थे। आज अपनी ही दी हुई उस धीमी तड़प को
थोड़ा महसूस करो।"
"तुम... तुम
जानबूझकर कर रही हो," रोहन ने
अपनी आँखें भींच लीं। उसके माथे और सीने से पसीने की बूँदें बहकर चादर पर गिर रही
थीं। उसकी छाती इतनी तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी कि उसके सीने के बाल नेहा के
कड़े हो चुके निप्पल्स से रगड़ खा रहे थे। "मुझसे अब और बर्दाश्त नहीं होता, नेहा। मेरी नसों में बिजली दौड़
रही है... क्या तुम्हें मेरी यह कठोरता महसूस नहीं हो रही?"
"सब महसूस हो
रहा है," नेहा ने
बहुत धीरे से अपनी कमर को केवल एक सूत नीचे झुकाया, जिससे उसके अंग का अग्रभाग उसकी अत्यधिक गर्म और गीली
दीवारों के बीच हल्का सा सरक गया। उस मामूली से घर्षण ने रोहन के पूरे शरीर में एक
तीखा झटका लगा दिया।
"आहहह!
उफ़्फ़... नेहा!" रोहन के मुँह से एक तीखी चीख निकली। उसने अपने दाँतों को
भींच लिया। "हाँ... बिल्कुल ऐसे ही... पर इतनी धीमी गति क्यों? मुझे पूरा अंदर जाना है... मुझे
अपनी पूरी गहराई तक तुम्हें महसूस करना है।"
"नहीं रोहन, अभी नहीं," नेहा ने उसकी आँखों में सीधे देखते
हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा नशा और आधिपत्य था। "मैं देखना चाहती हूँ
कि दफ़्तर का सबसे सख्त और रोबदार सीनियर जब बेबस होता है, तो उसकी आवाज़ में कितनी मिन्नतें
बचती हैं। मुझसे गिड़गिड़ाकर कहो। मुझे साफ़-साफ़ बताओ कि तुम्हें इस वक्त मेरी
जाँघों के बीच की इस गर्मी से क्या चाहिए।"
रोहन की
व्याकुलता अब अपने चरम पर थी। उसकी कमर बार-बार झटका खा रही थी, लेकिन नेहा की पकड़ और उसका संतुलन
इतना सटीक था कि रोहन चाहकर भी आगे नहीं बढ़ पा रहा था।
"मैं... मैं
मिन्नत करता हूँ, नेहा," रोहन ने हाँफते हुए, अपनी भारी आवाज़ में सिसकते हुए
कहा। उसकी आँखों में एक जंगली, बेकाबू
प्यास थी। "प्लीज... अपनी इस सुलगती हुई समुद्र को थोड़ा और नीचे लाओ। मेरे
इस सख्त चप्पू को पूरा का पूरा अपने अंदर उतार लो... मैं तड़प रहा हूँ, नेहा... अपनी पूरी गहराई से मुझे
भींच लो!"
उसके मुँह
से निकले ये तीखे, खुले और
नग्न शब्द सुनते ही नेहा के होंठों पर एक संतोषजनक चमक आ गई। उसने अपनी गति को
बिल्कुल नहीं बढ़ाया, लेकिन बेहद
धीमी, भारी और
घर्षण से भरी रफ्तार के साथ रोहन के अंग को इंच-दर-इंच अपने भीतर समेटना शुरू
किया।
हर एक
मिलीमीटर का सफ़र इतना धीमा और रगड़ से भरा था कि रोहन के मुँह से लगातार बेकाबू
कराहें और सिसकियाँ निकल रही थीं।
"आअआहहहह!
माँ... नेहा!" रोहन का पूरा शरीर अकड़ गया जब नेहा की गहराई उसका पूरा स्पर्श
पा चुकी थी। "यह... यह बहुत गर्म है अंदर... तुम अंदर से पूरी उबल रही
हो।"
"तो इस उबलती
हुई गर्मी में थोडा और जलो," नेहा ने
झुककर उसके कान के पास फुसफुसाया। उसकी जीभ ने रोहन की कान की लौ को चाटा।
"बताओ रोहन, क्या
तुम्हारी किसी रिपोर्ट में मेरी इस अंदरूनी जकड़न का कोई हिसाब था? कहो, क्या तुम्हें मेरी समुद्र की हर एक दीवार अपने अंग पर
भींचती हुई महसूस हो रही है?"
"हाँ! सब
महसूस हो रहा है... उफ़्फ़, नेहा!"
रोहन ने अपनी कमर को नीचे से थोड़ा ऊपर उठाने की कोशिश की। "पर अब ऐसे रुकना
बंद करो... अपनी कमर चलाओ! मुझे ज़ोर-ज़ोर से अपने ऊपर ठोको!"
"इतनी जल्दी
क्या है, रोहन?" नेहा ने अपनी कमर को बेहद धीमी
रफ्तार से ऊपर-नीचे खिसकाना शुरू किया। हर एक धक्का इतना आहिस्ता और घर्षण से भरा
था कि रोहन के हाथ-पैर फड़कने लगे थे। "दफ़्तर में जब तुम मुझे देर रात तक
काम पर रोकते थे, तब मैं भी
इसी तरह तड़पती थी। आज इस बंद कमरे में, इस तूफ़ान के बीच, तुम्हें मेरी हर एक चाल का हिसाब देना होगा।"
"नेहा... तुम
बहुत बेरहम हो रही हो," रोहन का गला
सूख चुका था। उसकी गर्दन की नसें उभर आई थीं। "मेरी जाँघें काँप रही हैं...
मेरी रीढ़ की हड्डी में आग लग गई है। मुझे आधा-अधूरा मत छोड़ो... अपनी रफ़्तार
बढ़ाओ!"
"माँग करो," नेहा ने उसकी दोनों कलाइयों को
कसकर थामते हुए अपनी रफ्तार को थोड़ा सा और धीमा कर दिया। "अपनी उस कड़क भाषा
को छोड़ो और मुझे बताओ कि तुम्हें मेरी जाँघों की यह टक्कर कैसी लग रही है।"
"यह मुझे मार
रही है, नेहा!"
रोहन ने चीखकर कहा, उसकी छाती
पर पसीने की नदियाँ बह रही थीं। "मेरी चूत... तुम्हारी समुद्र की यह जकड़न
मुझे पागल कर रही है! अपने इस जिस्म को मेरी कमर पर पटको... मुझे पूरी ताकत से
निचोड़ लो, नेहा...
साले, मुझे पूरी
तरह चोद डालो!"
रोहन के
मुँह से यह बेबाक और नग्न माँग सुनते ही नेहा के भीतर का संयम भी एक झटके में टूट
गया। उसकी आँखों में वासना की वहशी चमक आ गई। उसने अपनी कमर की गति को अचानक एक
भयानक, तेज़ और
बेकाबू रफ़्तार पर सेट कर दिया।
"थप... थप...
थप..."
कूपेनुमा
कमरे में नग्न शरीरों की टक्कर की आवाज़ गूँजने लगी। नेहा अब पूरी ताकत से रोहन के
ऊपर अपनी कमर चला रही थी। हर धक्के के साथ रोहन का सख्त अंग नेहा की गहराई से टकरा
रहा था, और रोहन के
मुँह से बेकाबू गालियाँ, चीखें और
सिसकियाँ एक साथ निकल रही थीं।
"आहहहह!
नेहा... उफ़्फ़! यह बहुत तेज़ है!" रोहन ने अपनी आँखें ऊपर चढ़ा लीं।
"हाँ... बिल्कुल ऐसे ही! ज़ोर से... और ज़ोर से! मुझे पूरी तरह से खत्म कर
दो!"
"यह लो, रोहन!" नेहा ने हाँफते हुए, अपने बालों को पीछे झटका और अपनी
गति को चरम तेज़ी पर पहुँचा दिया। "तुम्हारी हर एक अकड़ को आज मैं यहीं खत्म
करके रहूँगी!"
रोहन का
शरीर हर एक धक्के के साथ ऊपर उछल रहा था। उसकी तड़प, उसका दर्द और उसका चरम सुख एक साथ मिलकर कमरे की हवा
को पूरी तरह सुलग रहे थे। नेहा ने कभी अपनी रफ़्तार को अचानक धीमा करके उसे तड़पाया, तो कभी भयानक तेज़ी से धक्के मारकर
रोहन को सुख के उस आख़िरी छोर पर पहुँचा दिया।
"नेहा...
मैं... मैं अब नहीं रोक सकता!" रोहन की आवाज़ झटके खा रही थी। उसका पूरा शरीर
धनुष की तरह अकड़ चुका था। "मैं बिखर रहा हूँ, नेहा... मुझे पूरा भर दो!"
"बिखरने दो, रोहन!" नेहा ने एक आखिरी, गहरा और भयानक धक्का नीचे की तरफ़
मारा और खुद को रोहन के सीने पर पूरी तरह गिरा दिया।
उसी पल रोहन
का पूरा वजूद चरम सुख के एक ज़ोरदार झटके के साथ काँप उठा। उसने एक तीखी, भारी चीख के साथ खुद को नेहा की
गहराई में पूरी तरह खाली कर दिया, और नेहा ने
भी एक लंबी सिसकी के साथ रोहन को अपने आगोश में भींच लिया। दोनों हाँफते हुए
एक-दूसरे से चिपक गए, और बाहर के
तूफ़ान के बीच कमरे का सन्नाटा उन दोनों की शांत होती साँसों से भर गया।
गेस्ट हाउस
के उस सीलन भरे कमरे में मोमबत्ती की लौ अब छोटी हो चुकी थी, लेकिन उसकी मद्धम पीली रोशनी में
दोनों के पसीने से भीगे नग्न जिस्म सोने की तरह चमक रहे थे। दफ़्तर की तमाम
औपचारिकताएँ, औकाद और
शराफत का पर्दा इस बंद कमरे में पूरी तरह जलकर राख हो चुका था।
नेहा अब
रोहन के ऊपर पूरी तरह सवार थी। उसकी दोनों जाँघें रोहन की कमर को कसकर जकड़े हुए
थीं, और रोहन का
कड़ा, भारी और
सुलगता हुआ अंग नेहा की अत्यधिक गर्म और गीली समुद्र के मुहाने पर अटका हुआ था।
"बहुत अकड़
दिखाते थे ना दफ़्तर में, रोहन?" नेहा ने रोहन के सीने पर अपनी
हथेली से दबाव बनाते हुए एकदम सीधे, नग्न और बेबाक शब्दों में कहा। "आज तुम्हारी वह
सारी अकड़ मेरी जाँघों के बीच सिमट चुकी है।"
रोहन की
साँसें बुरी तरह उखड़ रही थीं। उसकी छाती इतनी तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी कि
उसके सीने के बाल नेहा के कड़े हो चुके निप्पल्स से लगातार घिस रहे थे।
"अकड़ की बात
मत करो, नेहा..."
रोहन ने दाँत पीसते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी बेबसी और बेकाबू तड़प थी।
"तुम्हारी समुद्र अंदर से इतनी गर्म है कि मेरा चप्पू वहीं फटने को हो रहा
है। तुम जानबूझकर अपनी कमर को ऊपर रोके हुए हो।"
"हाँ, रोहन, मैं जानबूझकर रोक रही हूँ," नेहा के चेहरे पर एक नटखट और कामुक
मुस्कान आ गई। उसने अपनी कमर को ज़रा सा भी नीचे नहीं किया, बल्कि केवल उस मुहाने पर हल्का सा
गोल घर्षण दिया। "मुझे देखना है कि जब तुम्हारा यह सख्त अंग मेरी समुद्र के
मुहाने पर घिसता है, तो तुम्हारे
मुँह से कैसे खुले शब्द निकलते हैं।"
"उफ़्फ़... नेहा!
साले... कमिनी!" रोहन के मुँह से एक तीखी कराह निकली। उसकी रीढ़ की हड्डी में
बिजली की लहर दौड़ गई। "यह आधा-अधूरा घर्षण करके मेरी जान मत लो। अपनी कमर को
थोड़ा नीचे लाओ और इसे पूरा अंदर सरकाओ!"
"ऐसे नहीं, रोहन," नेहा ने उसकी आँखों में आँखें
डालकर हुक्म दिया। उसकी आवाज़ में अधिकार और नशा था। "मुझे साफ़-साफ़, नग्न शब्दों में बताओ कि तुम्हें
इस वक्त मुझसे क्या चाहिए। कोई ढकी-छिपी बात नहीं। सीधे बोलो।"
रोहन ने
अपनी आँखें भींच लीं। लाज का आखिरी तिनका भी उड़ चुका था। उसकी जाँघों के जोड़ों
पर पसीना बह रहा था और उसका पूरा वजूद नेहा की एक चाल के लिए तरस रहा था।
"मुझे...
मुझे तुम्हारी इस सुलगती हुई समुद्र की गहराई चाहिए, नेहा!" रोहन ने हाँफते हुए, एकदम खुले और अशिष्ट शब्दों में
चीखकर कहा। "अपने इस जिस्म को मेरी कमर पर पटको! अपने इस रस से भीगे छेद में
मेरा पूरा का पूरा चप्पू उतार लो... मुझे तड़पाना बंद करो और मुझे ज़ोर-ज़ोर से
ठोको!"
रोहन के
मुँह से निकली यह नग्न माँग सुनते ही नेहा के भीतर की कामुकता भी पूरी तरह सुलग
उठी। उसकी आँखों में एक वहशी चमक आई।
"यह सुनो...
अब देखो मेरी रफ़्तार!"
नेहा ने
अपनी कमर को एक झटके से नीचे गिराया।
"आहहहहह!
उफ़्फ़... नेहा! माँ!"
जैसे ही
रोहन का कड़ा अंग नेहा की संकरी और सुलगती हुई दीवारों को चीरता हुआ उसकी गहराई तक
घुसा, रोहन के
मुँह से एक ऐसी चीख निकली जो कमरे के सन्नाटे को फाड़ती हुई निकल गई। हर एक मिलीमीटर
का प्रवेश इतना गहरा था कि रोहन की आँखें सुख के मारे ऊपर की ओर चढ़ गईं।
"कैसा लग रहा
है, रोहन?" नेहा ने झुककर उसके कान के पास
अपने होंठ रखे और जीभ से उसकी त्वचा को सहलाते हुए बेहद धीमी गति से अपनी कमर को
आगे-पीछे करना शुरू किया। "बताओ, क्या तुम्हारी किसी रिपोर्ट में मेरी इस समुद्र की
कसावट का कोई हिसाब था?"
"नहीं... कोई
हिसाब नहीं था," रोहन का गला
सूख चुका था। उसकी कमर खुद-ब-खुद ऊपर उठकर नेहा की चाल के साथ टकराने की कोशिश कर
रही थी। "यह... यह बहुत मोटा लग रहा है अंदर... तुम्हारी समुद्र मेरे चप्पू को
इतनी कसकर भींच रही है कि लग रहा है निचोड़ लेगी।"
"तो निचोड़ने
दो," नेहा ने
बेहद धीमी और भारी रफ़्तार से अपनी कमर को ऊपर उठाया और फिर उतने ही ज़ोर से
आहिस्ता-आहिस्ता नीचे दबा दिया। "मैं चाहती हूँ कि तुम मेरी इस एक-एक चाल को, इस घर्षण को अपनी आत्मा तक महसूस
करो।"
"यह धीमी गति
मुझे मार डालेगी, नेहा!"
रोहन ने तड़पकर कहा। "मुझे आधा-अधूरा मत महसूस कराओ... अपनी रफ़्तार बढ़ाओ!
अपनी पूरी ताकत से मेरे ऊपर धक्के मारो!"
"माँग करो
मुझसे!" नेहा ने उसकी दोनों कलाइयों को अपने हाथों में कसकर थाम लिया और उसकी
छाती पर झुक गई। "बताओ मुझे कि तुम्हें मेरी जाँघों की यह टक्कर कितनी गहराई
तक चाहिए।"
"मुझे पूरी
गहराई तक चाहिए, नेहा!"
रोहन ने अपनी कमर को झटके से ऊपर उठाते हुए चीखकर कहा। "अपनी समुद्र की पूरी
ताकत मेरे ऊपर लगा दो! मेरी कमर पर बैठकर मुझे ज़ोर-ज़ोर से चोद डालो!"
रोहन के
मुँह से यह सीधी माँग सुनते ही नेहा का संयम पूरी तरह टूट गया। उसने अपनी कमर की
गति को अचानक एक भयानक, तेज़ और
बेकाबू रफ़्तार पर सेट कर दिया।
"थप... थप...
थप..."
गेस्ट हाउस
के कमरे में दोनों के नग्न जिस्मों की भयानक टकराव की आवाज़ें गूँजने लगीं। बाहर
की मूसलाधार बारिश और तूफ़ान का शोर अब इस बेकाबू रफ़्तार के सामने पूरी तरह फ़ीका
पड़ चुका था। नेहा अब पूरी आक्रामकता के साथ रोहन के ऊपर अपनी कमर चला रही थी। हर
एक धक्के के साथ रोहन का सख्त अंग नेहा की गहराई से टकरा रहा था, और रोहन के मुँह से बेकाबू गालियाँ, चीखें और सिसकियाँ एक साथ निकल रही
थीं।
"आहहहह!
नेहा... उफ़्फ़! यह बहुत तेज़ है!" रोहन ने चादर को अपने हाथों में दबा लिया।
उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे उछल रही थी। "हाँ... बिल्कुल ऐसे ही! ज़ोर से...
और ज़ोर से! मुझे पूरी तरह से खत्म कर दो!"
"यह लो, रोहन!" नेहा ने हाँफते हुए, अपनी पसीने से भीगी लटों को पीछे
झटका और अपनी गति को चरम तेज़ी पर पहुँचा दिया। "तुम्हारी हर एक अकड़ को आज
मैं यहीं खत्म करके रहूँगी!"
रोहन का
शरीर हर एक धक्के के साथ ऊपर उछल रहा था। उसकी तड़प और उसका चरम सुख एक साथ मिलकर
कमरे की हवा को सुलग रहे थे। नेहा ने कभी अपनी रफ़्तार को अचानक धीमा करके उसे
सुलगता घर्षण दिया, तो कभी
भयानक तेज़ी से धक्के मारकर रोहन को सुख के उस आख़िरी छोर पर पहुँचा दिया।
"नेहा...
मैं... मैं अब नहीं रोक सकता!" रोहन की आवाज़ झटके खा रही थी। उसका पूरा शरीर
धनुष की तरह अकड़ चुका था। "मेरी नसों में बिजली दौड़ रही है... मैं बिखर रहा
हूँ!"
"बिखरने दो, रोहन!" नेहा ने एक आखिरी, गहरा और भयानक धक्का नीचे की तरफ़
मारा और खुद को रोहन के सीने पर पूरी तरह गिरा दिया।
उसी पल रोहन
का पूरा वजूद चरम सुख के एक ज़ोरदार झटके के साथ काँप उठा। उसने एक तीखी, भारी चीख के साथ खुद को नेहा की
गहराई में पूरी तरह खाली कर दिया, और नेहा ने
भी एक लंबी सिसकी के साथ रोहन को अपने आगोश में भींच लिया। दोनों हाँफते हुए
एक-दूसरे से चिपक गए, और बाहर के
तूफ़ान के बीच कमरे का सन्नाटा उन दोनों की शांत होती साँसों से भर गया।
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