बर्फीली रात की गर्माहट
नेहा नाम था उसका। पहली ही नज़र में देखता चला गया, चेहरा
ऐसा कि आँखों के रास्ते कब दिल में उतर गई, पता ही नहीं
चला। लेकिन जितनी खूबसूरत, उतनी ही तेज। किसी से बात तक नहीं करती थी। मैं
अपनी सीट पर बैठा उसे बस देखता रहता। पूरा ऑफिस उसका दीवाना था।एक दिन बॉस ने मुझे अपने केबिन में बुलाया। केबिन में पहुँचा तो एक
कुर्सी पर नेहा बैठी थी। उसे देखकर मेरा दिल धड़कने लगा, मगर अपनी
भावनाओं पर काबू पाकर मैं खड़ा रहा। बॉस ने बैठने का इशारा किया। मैं उसकी बगल में
बैठा, जैसे लगा कि कोई सपना देख रहा हूँ।बॉस ने बिना किसी औपचारिकता के सीधे कहा, "अगले
रविवार श्रीनगर के ऑफिस की ओपनिंग है। आप दोनों को वहाँ जाना है। ये हैं मिसेज
ठक्क्कर, ये इंटरनल डेकोरेशन एवं प्रोग्राम की व्यवस्था देखेंगी और आप जल्द से
जल्द वहाँ के सर्वर का काम निपटाएँगे। चूँकि सर्वर रूम और इंटरनल डेकोरेशन का आपस
में सीधा संबंध है, इसलिए आप दोनों एक-दूसरे की मदद करेंगे और आपसी विचार-विमर्श से
चलेंगे।""कल और परसों आप दोनों यहाँ बैठकर सारे सामानों की लिस्ट और कैसे क्या
करना है, डिस्कस कर लें। बुधवार की शाम आपको निकलना है।" बॉस ने एक साँस में पूरी बात ऐसे कह दी, जैसे हर पल उसके
सर पर बम गिर रहा हो। मैं कुछ पूछता, उसके पहले ही उसने कहा, "आप
दोनों जा सकते हैं।" और टेलीकॉम पर किसी दूसरे को अंदर भेजने का आदेश दे
दिया। अगले दो दिनों तक हम ऑफिस व बाजार के चक्कर लगाते रहे। मुझे तो जैसे
लगा कि स्वर्ग का सुख मिल गया हो।
बुधवार की शाम हम लोग श्रीनगर के लिए निकले। जैसे ही मनाली से कुछ
आगे बढ़े, अचानक मौसम ने करवट ली और बर्फ गिरनी शुरू हो गई। गाड़ी
आहिस्ता-आहिस्ता जा रही थी, लेकिन एक ढलान पर गाड़ी स्लिप कर पेड़ से जा
टकराई। हम दोनों और ड्राइवर किसी तरह बाहर निकले। रात होने लगी थी, तभी
ड्राइवर ने कहा, "साहब, आप परेशान मत होइए, रात में कोई गाड़ी तो मिलेगी नहीं, लेकिन
यहाँ एक मेरे परिचित का मकान है। आप उसमें रुक सकते हैं। मैं गाड़ी के पास ही
रहूँगा, जैसे ही कोई लिफ्ट मिलेगी, आपको बुला लूँगा।" मैंने आश्चर्य से पूछा, "इस रास्ते में तुम्हारा
परिचय कैसे?" तो उसने बताया, "साहब, मैं इधर का ही हूँ। इसलिए बड़े साहब जब इधर
जाना होता है, हमें ही भेजते हैं। ऐसा कभी हुआ नहीं था, आज कैसे हो गया,
पता
ही नहीं चला।" वह हम लोगों को लेकर एक पास बने मकान में पहुँचा। वहाँ का मालिक नीचे
आराम कर रहा था। ड्राइवर को देखते ही पहचान गया। ड्राइवर ने सारी बात बताई,
तो
वह बोला, "ये दोनों तो काफी भीगे हुए हैं, कमरा भी एक ही
है, कैसे होगा?"मैंने नेहा की तरफ देखते हुए कहा, "हम यही नीचे
रहेंगे, वह ऊपर के कमरे में चली जाएगी।" मालिक बोला, "नहीं, यहाँ कोई नहीं रहेगा। आप बाहर तबेले में रह
सकते हैं, अभी खाली पड़ा है।"
हम दोनों को वहाँ छोड़कर ड्राइवर गाड़ी के पास चला गया। नेहा ऊपर चली
गई, मैं बाहर था। बर्फ तेज हो गई थी, लेकिन उसी बर्फ
में ड्राइवर गाड़ी में रखा डिनर पैकेट लाकर दे गया। मैं तबेले में बैठा ठंड से काँप रहा था, तभी नेहा के फोन
की घंटी बजी। मैंने फोन उठाया, तो उसने कहा, "रातभर में मरने
का इरादा न हो, तो ऊपर आ जाओ।" मैंने कहा, "कैसे रहेंगे एक साथ?"तो उसने कहा, "ऊपर आओ।"मैं सीधे उसके कमरे में पहुँचा। अपने गीले कपड़े उतारकर वह वहाँ
मौजूद एक लाल साड़ी पहन चुकी थी, जिसमें वह बला की खूबसूरत लग रही थी।बाहर का मौसम बहुत ही खराब था। कमरा भले ही बंद था, लेकिन
ठंड का एहसास अंदर भी था। मुझे लग रहा था कि इस कमरे में जमाने से कोई आया नहीं था,
इसलिए
बदबू भी थी, गंदगी भी थी। मगर हमें तो रात काटनी थी किसी तरह।मैं ठंड भगाने के लिए नाटकीय अंदाज में योगा करने लगा। मैं बाहर की
ठंड से अंदर तक हिला हुआ था। वह खिड़की पर खड़ी होकर मेरे तमाशे को देख रही थी और
मुस्कुरा रही थी। उसकी अदाएँ देखकर मुझे उसे अपनी बाहों में लेने का मन हो गया था।तभी उसके पति का फोन उसके मोबाइल पर आया। "हाँ जी... जी
हाँ..."। उसने अभी मोबाइल नीचे किया ही था कि तेज हवा के झोंके से पूरी खिड़की
खुल गई और उसका पूरा बदन भीग गया। संगमरमर सी उसकी सूरत, साँवला रंग,
भीगे
कपड़ों में उसका बदन ऐसा मदहोश कर देने वाला लग रहा था कि मैं खुद को रोक नहीं
सका।हवा का झोंका इतना तेज था कि वह मुझसे टकरा गई। मैं उठकर खिड़की को
बंद करने की कोशिश कर रहा था, मगर तेज हवा जीत रही थी। तभी वह भी आकर मेरा
साथ देने लगी। मेरे हाथ बार-बार उसके पहाड़ों से टकरा जा रहे थे।किसी तरह खिड़की बंद हुई, तब तक हम दोनों बुरी तरह भीग चुके थे। अब हमारे
पास सिवाय दो चादरों के जो बिस्तर पर बिछी थीं ओढ़ने के लिए और कुछ नहीं था।
आज की रात मौत तय लग रही थी।वह कमरे के एक कोने में जाकर अपने कपड़े बदलकर चादर लपेट ली, और
मैं दूसरी तरफ चेहरा करके चादर लपेटने लगा। अभी तो रात के नौ ही बजे थे, पूरी
रात बाकी थी।ड्राइवर ने फोन करके बता दिया था कि बर्फ और बारिश तेज होने के कारण
गाड़ी को सड़क पर लाना मुश्किल है। वह पास के गाँव में जा रहा था, सुबह
आएगा।समझ में नहीं आ रहा था कि रात कैसे कटेगी। कमरे में बिजली भी नहीं थी,
अब
अँधेरा छा गया था। नेहा एक कोने में सिमटकर बैठी थी। अब उसे ठंड का एहसास तेज हो
रहा था।हो भी क्यों ना?कमरा पूरा गीला हो चुका था। अंदर ठंडी हवा प्रवेश कर पूरे कपड़ों और
बिस्तर को नम कर चुकी थी। शीशे पर बर्फ, छत पर बर्फ।मैं उसके पास जाकर कंबल उसके शरीर पर डाल दिया। मगर उसकी हालत और
खराब हो रही थी। मैं उसके पास बैठ गया और कुछ बातें करने लगा, जिससे
उसका मन बहले।मगर ठंड से हमारी जुबान भी साथ नहीं दे रही थी।मेरे बदन में भी कंपकंपी छूट रही थी।मुझे न जाने क्या सूझा, मैंने उसकी हथेली लेकर रगड़ना शुरू किया,
जिससे
उसे कुछ गर्मी का एहसास हो। लेकिन अगले ही पल मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ और मैं
उसकी हथेली छोड़कर हटने लगा।तभी उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और सिर हिलाकर इशारा किया,
"रुको..." , शायद मेरे इस तरीके से उसे कुछ राहत मिली होगी, मैं
पास ही बैठ गया। मेरी निगाह बार-बार उसके चेहरे पर चली जा रही थी, और
मैं हटा रहा था।
"क्यों, कुछ परेशान लग रहे हो?" उसने मुझसे पूछा।
"नहीं, ऐसी बात न..." मेरे जुबान मेरा साथ नहीं दे पाए, ठंड
से काँपने लगा।
"बात तो कुछ है जो तुम बताना नहीं चाहते हो। अच्छा, ये
बताओ कि तुम ऑफिस में मुझे चोरी-चोरी देखते थे, न?"
मैं कुछ न बोला।
"तुम अभी भी बार-बार मुझे देखना चाहते हो, न?"
उसने
पूछा।
"हाँ," मैंने टूटती साँसों में जवाब दिया।
"तो लो, देख लो आज पूरी तरह। पता नहीं, कल ठंड से जम
जाए हम।"
"नहीं-नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा, मैं अभी आग का
प्रबंध करता हूँ।" कहकर मैं बाहर निकलने लगा। मगर उसने जोर से मेरा हाथ खींचा। मैं इसके लिए तैयार न था और सीधा
उसके बदन पर गिरा। मेरे गिरते ही उसकी चादर खुल गई और उसके पठार पर बने दो
पर्वत-श्रृंखला तनकर खड़ी थीं, वे दबाव से और तन गईं। "पागल हो गए हो! इस तूफानी रात में कहाँ मिलेगी आग तुम्हें? नीचे
वालों का रास्ता भी बाहर से है, वहाँ तक अँधेरे में कैसे जाओगे?" उसे अपने खुलेपन का एहसास शायद नहीं हुआ, वह बोले जा रही
थी। मगर उसके पहाड़ों की गर्मी ने मुझे राहत जरूर दे दी। तभी उसे इसका एहसास हुआ,
उसने
कंबल खींचा तो वह कंबल मेरे शरीर के ऊपर भी आ गया। अब मेरा चेहरा उसके पेट पर था
और मेरी साँसों की गर्मी उसके पेट को गर्म कर रही थी। उसके मुँह से साँसें जोर से निकलने लगीं। उसने अपना हाथ कंबल के अंदर
कर मेरे चेहरे को सीने से पकड़ लिया और तेजी से कंबल के अंदर आ गई। शायद वह कुछ
चुभन महसूस कर रही थी, जो उसे राहत दे रही थी।
अब मेरे होंठ उसके होंठों के आमने-सामने थे। मेरे हाथ उसके समुद्र के
किनारे, जहाँ बहुत गर्मी थी। वह अब धीरे से बोली "मेरे बदन में समा कर मुझे गर्मी का एहसास दो।" मैंने उसके गालों पर अपने होंठ रख दिए तो वह शर्म से लाल हो गई। उसके
हाथ मेरे सीने पर बने दोनों बटन को नोचने लगे। मैं उसकी काली जुल्फों से खेलता हुआ
अब उसके पहाड़ों की चोटी का रसास्वादन करने लगा।बाहर की ठंड अब गर्मी में बदल चुकी थी। तभी उसने अपनी मादक निगाहों
से मुझे देखते हुए कुछ इशारा किया और अपने आप में समा जाने का निमंत्रण दिया।
मेरा एक हाथ उसके पहाड़ों पर कूद रहा था, तो दूसरा हाथ
समुद्र के किनारे पर खड़ा उत्पात मचा रहा था। तभी उसने कहा "मेरे समुद्र की तलहटी तुम्हारा इंतजार कर रही है," और
कसकर मेरे सीने से चिपक गई। लेकिन मेरा तो आज उसके अंग-अंग पर अपना नाम लिखने का मन था। मैं उसके
गोरे पैरों पर अपने लब रखते हुए आगे बढ़ रहा था। वह मादकता में बोली "क्या करोगे? आज मुझे तड़पाते ही रहोगे? आओ
न, समा जाओ न।" लेकिन मैं तो अपनी ही दुनिया में था। उसकी हालत ऐसी हो गई थी कि उसने
नाव की पतवार खुद अपने हाथों में ले ली और उसके ऊपरी भाग का आकार अपने होंठों से
सही करने लगी। अब न कंबल था, न चादर तो केवल नेहा का संगमरमरी बदन। उसे देखते हुए
मेरा दिल धड़क रहा था। अब तो हम एक-दूसरे में समाने के लिए पूरी तरह तैयार हो गए
थे।जैसे-जैसे चप्पू समुद्र में जा रहा था, नेहा मेरे सीने
को जोर-जोर से खींच रही थी। उसके होंठ मेरे होंठों पर थे। उसने धीरे से कहा "और गहराई नापो, जरा धीरे-धीरे।" उसने मुझे बड़ी तेजी से अपनी तरफ खींचा और चेहरे पर गजब का भाव बना
कर निढाल हो गई।
तूफान बाहर का तो नहीं थमा था, लेकिन अंदर का
तूफान थम गया था। "आज की तुम्हारी बारिश में मैं पूरी तरह भीग गई, संतुष्ट
हो गई," उसने धीरे से कहते हुए कंबल खींच लिया और मुझसे ऐसे चिपक गई जैसे कली
भँवरे से लिपट जाती है। बारिश अब भी धीमे-धीमे गिर रही थी। कमरे में हल्की ठंडक थी, लेकिन
कंबल के अंदर सबकुछ गर्म था। नेहा मेरी बाहों में सिमटी हुई थी, उसकी
साँसें अब भी तेज चल रही थीं। मैं उसकी पीठ सहला रहा था, और वो
हल्के-हल्के मेरे सीने पर उंगलियाँ घुमा रही थी। कुछ देर की खामोशी के बाद मैंने मज़ाकिया लहज़े में पूछा,
"अच्छा, एक बात बताओ… तुम्हारे ये पहाड़ इतने खूबसूरत कैसे हैं?
कोई
खास देखभाल करती हो?" वो पहले तो मेरी ओर देखकर मुस्कुराई, फिर हल्की चपत
लगाते हुए बोली, "बेवकूफ कहीं के! हाँ, रोज़ सुबह सूरज की धूप दिखाती हूँ, और
रात को चाँदनी में नहलाती हूँ।" मैं हँस पड़ा, "अब समझा, तभी तो इतनी चमक
है इनमें!" हा ने अपनी उंगलियों से मेरी हथेली को छूते हुए कहा, "और
तुम? तुमने जो अभी किया… सच बताओ, ऐसा पहली बार
किया या पहले से ही एक्सपर्ट हो?" मैंने मुस्कुरा कर कहा, "अभी-अभी
ट्रेनिंग पूरी की है, और ट्रेनिंग बहुत ही शानदार रही!"वो खिलखिला पड़ी, फिर आँखें मिचकाते हुए बोली, "अब
ये ट्रेनिंग और आगे बढ़ानी पड़ेगी, ताकि परफेक्शन आ जाए।" मैंने उसकी ठोड़ी पकड़कर हल्के से ऊपर किया और आँखों में झाँकते हुए
कहा, "फिर तो सिखाने वाली को भी और मेहनत करनी पड़ेगी!" नेहा ने नकली गुस्से से आँखें तरेरी, फिर अचानक मेरा
हाथ पकड़कर खींच लिया। "ठीक है जी, अब मैं तुम्हें ट्रेनिंग में पास करके ही
रहूँगी!"
हम दोनों फिर हँस पड़े। कमरे की दीवारों ने हमारी बातें सुनीं,
हमारी
हँसी को अपने भीतर समेट लिया। बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन अब ठंड का
एहसास बिल्कुल भी नहीं हो रहा था…नेहा मेरी छाती पर अपने दोनों हाथ रखकर झुकी, उसकी आँखों में
एक अजीब सी चमक थी, जैसे वो कोई नया खेल खेलने वाली हो। उसके होंठों पर शरारती मुस्कान
थी, और उसकी साँसें अब भी तेज़ थीं। "अच्छा, तो तुम चाहते हो कि इस बार मैं अपनी मर्जी से सब कुछ करूँ?"
उसने
मेरी आँखों में झाँकते हुए पूछा। "हाँ, बिलकुल। देखता हूँ तुम क्या कर पाती हो।" मैंने चुनौती भरे
अंदाज़ में कहा।
नेहा ने हल्के से अपने दाँत काटते हुए होंठ दबाए, फिर
धीरे-धीरे मेरी छाती पर अपने नाखून चलाने लगी। उसकी उंगलियाँ मेरे बदन पर सरक रही
थीं, कभी छू रही थीं, कभी हट रही थीं। उसकी इस चंचलता ने मेरी साँसें
और गहरी कर दीं।फिर वह अचानक उठी और मेरे ठीक ऊपर ऐसे बैठ गई जैसे किसी जहाज की
पायलट हो, जो अब पूरे नियंत्रण में थी। उसकी जांघें मेरे इर्द-गिर्द कसने लगीं,
और
उसने हल्के से मेरे कंधों पर हाथ रख दिए।"तो अब ये समंदर मेरी मर्जी से लहरें उठाएगा, और ये पहाड़
मेरी मर्जी से साँस लेंगे," उसने धीरे से कहा। उसका ये अंदाज़ मुझे और पागल कर रहा था।
मैंने हल्के से उसके नंगे
पीठ पर अपनी उंगलियाँ फिराईं, जिससे उसकी कमर हल्के से झटकी। "अभी मत छूना…" उसने धीमे स्वर में कहा और मेरी उंगलियाँ थाम
लीं। वह धीरे-धीरे अपने सीने को मेरे चेहरे के करीब ला रही थी, जैसे
चाहती हो कि मैं खुद ही अपनी प्यास को और बढ़ाऊँ। उसकी साँसें मेरे कान के पास आकर
ठहर गईं, और उसने फुसफुसाते हुए कहा, "अब भी लगता है
कि मैं नहीं कर पाऊँगी?" मैंने कोई जवाब नहीं दिया, बस उसकी आँखों में देखता रहा। नेहा ने मेरी ठोड़ी को हल्के से ऊपर किया और अपने होठों को मेरे
होठों के बिल्कुल करीब ले आई। लेकिन चूमी नहीं, बस मेरी बेचैनी
को और बढ़ा दिया। "अब तुम मेरा इंतजार कर रहे हो, ना?" मैंने हल्का सा सिर हिलाया, तभी उसने हल्की हँसी के साथ मेरे कंधे पर अपने
होंठ रख दिए। उसकी साँसों की गर्मी ने मेरे शरीर को और उत्तेजित कर दिया। अब वह धीरे-धीरे अपने शरीर को आगे-पीछे करने लगी, जैसे
किसी लय में बह रही हो। उसकी गर्म जांघें मेरे शरीर को जकड़ रही थीं, और
उसकी उंगलियाँ मेरी छाती पर धीमे-धीमे चल रही थीं। "तुम जानते हो, जब कोई औरत अपनी मर्जी से कुछ करती है, तो
वो उसे और गहराई से महसूस करती है…" नेहा की आवाज़ अब और भी मखमली हो गई थी। "तो फिर महसूस करो…" मैंने उसके कान में फुसफुसाया।
अब वह और आगे झुकी, उसकी उँगलियाँ मेरे कंधों को जोर से पकड़ रही
थीं। उसकी पीठ पर पसीने की हल्की नमी चमक रही थी, और उसके बाल
मेरे चेहरे पर गिर रहे थे। "अब इसे कोई नहीं रोक सकता…" उसने आँखें बंद
करते हुए कहा और खुद को पूरी तरह मेरे साथ बहने दिया। कमरे
में सन्नाटा था, बस हमारी साँसों की आवाज़ थी। बाहर बारिश अब भी गिर
रही थी, लेकिन कमरे के अंदर एक और ही तूफ़ान आ चुका था…।
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