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नृत्‍य सीखाने में लिया

 शाम होने को आई, ट्रेन दिल्‍ली की सीमा पार कर आगरा पहुँच चुकी थी, तभी दरवाजे पर हरकत हुई और दो जोड़ो ने प्रवेश किया। पसीने से लथपथ दोनो को एसी की हवा ने ठंडी राहत दिया। दोनो के बैठते ही नास्‍ता आ गया, नास्‍ता करते करते दोनो रिलेक्‍स मोड में आ चुके थे। तभी टीटी आया और टिकट चेक करने लगा, टीटी से ही पता चला कि नये आये जोड़े का नाम अमित और आलीशा है दोनेा बंगलौर तक जायेगें।

ट्रेन में कभी अमित और आलीशा की तो कभी श्रुति और राघव की आवाज गूज रही थी। ट्रेन धीरे धीरे झासी की ओर बढ रही थी। हल्‍का अंधेरा होने को आया। अमित ने अपने बैग से एक विस्‍की की बोलत निकाला और राघव से बोला यदि आपको एतराज न हो तो मैं अपनी शाम को रंगीन कर लूँ, बात वह राघव से पूछ रहा था मगर निगाहे उसकी श्रुति पर थी। क्‍यों इसके बिना शाम नहीं होती क्‍या श्रुति ने बीच में ही रोक पर राघव की तरफ देखते हुए पूछा। दोनो हंस पड़े, अमित ने हसते हुए राघव से पूछा आप भी लेते हैं, राघव ने श्रुति के तरफ देखते हुए कहा कभी कभी, उसके चेहरे पर मुस्‍कुराहट थी। तो आईये कभी कभी आज तभी तभी हो जाये, अमित ने अपने बैग से दो गिलास निकले और पैग बनाने लगा। दोनो के पैग खुल गये। अलीशा और श्रुति अब बोर हो रही थी, दोनो ने आपस में बात शुरू कर दिया था। आप बंगलौर ही रहते हो श्रुति ने पूछा नहीं मैं तो एक नृत्‍य प्रतियोगिता में भाग लेने जा रही हूँ, मेरे पति का डांस कम्‍पटीशन है अलीशा ने कहा, और आप कहॉं जा रही हैं अलीशा ने प्रश्‍न किया । मैं तो बंगलौर इनके साथ जा रही हूँ इनके फोटोग्राफी की प्रदर्शनी लग रही है उसी में इनके साथ जा रही हूं। श्रुति ने कहा। तो आपको भी फोटोग्राफी पंसद है अलीशा ने पूछा नहीं मुझे तो नृत्‍य पंसद है मगर इनको नहीं इस लिए मैं कम ही घर से करती हूँ कही सीख नहीं पाई। श्रुति ने उदास होते हुए जबाब दिया। यही हाल मेरा है मुझे फोटोग्राफी पंसद है मगर मेरे पति देव ने कभी मेरी सुनी ही नहीं, इस लिए बस इनके साथ चलती हूँ और अपना शौक पूरा करती हूँ।, आपके पति तो आपकी बेहतरीन फोटो निकालते होगें। आलीशा ने पूछा । कौन किसकी फोटो निकाल रहा है भाई जरा मुझे भी बताओं राघव ने विस्‍की का गिलास थामे प्रश्‍न किया। लो फोटो की बात हुई नहीं कि जनाव के कान खड़े हो गये, श्रुति ने हसते हुए कहा। अलिशा को फोटोग्राफी बहुत पंसद है, श्रुति ने राघव को बताया श्रुति को तो नृत्‍य बहुत पंसद है मगर मुझे यह फालतू लगता है, राघव ने आलिशा की तरफ देखते हुए कहा। क्‍या बात कर रहे हैं भाई साहब नृत्‍य तो जीवन की जान है अमित ने बात कटाते हुए कहा। आलिशा एक बात कहें अमित ने अपनी बीबी की ऑंखो में डाल कर पूछा, कहों क्‍यों न आज हम लोग बर्थ बदल लें तुम फोटोग्राफी देखों मैं आलिशा को नृत्‍य दिखाता हूँ। बिल्‍कुल। अब अमित श्रुति को नृत्‍य की बातें बताने लगा और राघव आलिशा को अपनी फोटोग्राफी दिखाने लगा। रात को होने को आई दोनो की आंखो में नशा था। आज इतनी बाते हो गई, क्‍यों न इस रात को यादगार बनाया जायें, अमित ने श्रुति के बदन पर निगाह डालते हुए कहा, । वह कैसे राघव ने पूछा आज हम अपने पार्टनर बदल लें, टेस्‍ट अमित यह क्‍या बकवास है आलिशा ने अमित को डॉंटते हुए कहा। श्रुति भी उसके तरफ आंखें निकाल कर घुरी। दोनेा खडे होकर अपने अपने बिस्‍तर बिछाने लगी, तभी ट्रेन झांसी स्‍टेशन से रवाना होने को आई, बातों बातों में पता ही नहीं चला कि झांसी कब आ गया। ट्रेन ने अचानक झटका लिया और आलिशा पीछे की तरफ उलट गई, वह सीधे श्रुति को गिराते हुए राघवके गोद में जा गिरी, और इधर श्रुति भी अमित के चेहरे से टकराई, पूरी जाम का गिलास श्रुति के चेहरे से टकरा गया। दोनो एक दूसरे से हटना चाह रही थी तभी एक और जोरदार झटका लगा, और वह उठ नहीं पाई। चलो गुस्‍सा थूक दोनो आओ बैठों, भाई राघव आप मेरी बीबी को फोटोग्राफी के गुण बताओं उसकी इच्‍छा है फोटोग्राफर बनने की, बिलकुल बतायेगें, आईये आलीशा जी यहॉं आये, । और तुम श्रुति अमित जी से नृत्‍य को समझों यदि ठीक सलाह मिली तो देखा जायेगा। दोनो महिलाएं खुश हो गई, राघव आलीशा की फोटोग्राफी करता उसे दिखाता उसे समझता, और श्रुति अमित से नृत्‍य के स्‍टेप सीखने के लिए खड़ी हो गई। वह कभी इस हाथ कभी उस हाथ में लेकर उसे नृत्‍य के रहस्‍य बताता। धीरे धीरे चारों के बीच की दिवार गिरने लगी।श्रुति दीवार से टिककर गहरी साँसें ले रही थी। उसकी उँगलियाँ अब ब्लाउज़ की पकड़ को खुद कमजोर कर रही थीं। बाल बिखरे थे, गला पसीने से भीग चुका था।

उसने अमित की आँखों में देखा —
"आपको पता है...? इतना खुलकर... इतनी गहराई से... कभी किसी ने नहीं छुआ मुझे।"

अमित ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा, और कुछ नहीं कहा।
वो उसकी उँगलियाँ अपनी छाती पर रखता है, फिर गर्दन के पीछे ले जाता है।

"इतना कनेक्ट कभी फील नहीं हुआ..."
श्रुति की आवाज़ धीमी, लेकिन साफ़ थी।
"आज जो हो रहा है, वो सिर्फ फिजिकल नहीं है… यह कुछ और है। ये वो हिस्सा है जो मैं हमेशा छुपाती रही, क्योंकि कभी किसी ने जानने की कोशिश ही नहीं की थी।"

अमित अब उसकी पीठ को सहला रहा था — उसकी ब्लाउज़ की डोरी धीरे-धीरे उसके स्पर्श के साथ खुल रही थी। कपड़ा अब सिर्फ टिके हुए था, बंधा कुछ नहीं था।

श्रुति ने उसकी कमर को खींचा, अपने पास लाया —
"छोड़िए न सब सोचना। अभी सिर्फ मैं हूँ और आप हैं।
बाक़ी दुनिया... वो कहीं बहुत पीछे छूट चुकी है।"

उसके होंठ अब अमित की गर्दन के पास थे।
उसने चूमने से ज़्यादा महसूस किया —
एक रुक-रुक कर जमी हुई गर्मी को छू रही थी।

"मेरे जांघों में जो कंपन है ना, वो सिर्फ उत्तेजना नहीं है। ये उन सालों की पेंडिंग चाह है, जो कभी पूरी नहीं हुई।"

अमित अब उसके पेट के नीचे तक जा चुका था, उँगलियाँ उसके साड़ी के नीचे की गर्म हवा को पढ़ रही थीं। कपड़ा अब शरीर से हटने को खुद तैयार था।

"रुकिए मत... प्लीज़। मुझे रोकने की आदत रही है। आज पहली बार ऐसा लग रहा है कि किसी ने मुझे पूरा खोलने की हिम्मत की है।"

उसने खुद अपनी साड़ी को एक हाथ से पकड़ा और घुटनों तक खिसका दी।

"मैं सिर्फ छुई नहीं जाना चाहती। मैं पूरी तरह फील करना चाहती हूँ।
मेरे पैरों के बीच, मेरी पीठ की नसों में, मेरे सीने की गोलाई पर — हर जगह... एक पहचान चाहिए।"

अमित उसके सामने बैठ गया — अब वो उसके पैर पर हाथ रखता है, जैसे कोई किताब पढ़ रहा हो — ध्यान से।

"आप जो कर रहे हैं न..."
"वो सिर्फ स्पर्श नहीं है। आप मेरी अधूरी कहानी को पूरा कर रहे हैं। पेज-दर-पेज।"

उसने अमित का चेहरा ऊपर उठाया, अपनी आँखों के पास लाया —
"अब देखिए मुझे वैसे... जैसे कोई पहली बार अपनी असली चीज़ देखता है — बिना परत, बिना पर्दे।"

अमित ने कुछ नहीं कहा — वो अब उसकी गर्दन से लेकर सीने तक नीचे गया, और धीरे-धीरे अपने होंठ उस जगह ले गया जहाँ उसकी उंगलियाँ पहले गई थीं।

"हाँ... यहीं। यहीं चाहिए मुझे आप।
जैसे कोई अंदर घुसता है, लेकिन देह में नहीं... मेरे अंदर की उस भूख में, जो मैंने हमेशा छुपाई है।"

अब उसका बदन अमित की उँगलियों में नहीं, उसकी रफ़्तार में था।

"और… थोड़ा और अंदर जाइए।
मेरी जांघों की रगें कह रही हैं कि रुकिए मत।
आज मैं पूरी तरह आपकी हूँ — जैसे कभी खुद अपनी भी नहीं थी।"

उसने धीरे से एक हाथ अमित के बालों में डाला, दूसरा उसकी कमर में खोंस दिया।

"इतना गहराई में जाइए कि मुझे खुद से बाहर निकाल लें।
इतना पास आइए कि मैं कह सकूँ — हाँ, आज मैं पूरी तरह महसूस हुई हूँ।
आज पहली बार..."
"...मुझे पता चला कि मैं भी कोई हूँ। एक औरत — पूरी, पागल, और जिंदा।"

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