नीरज कमरे में बैठा था। एसी की ठंडी हवा चल रही थी, कमरे में हल्की पीली लाइट थी, और उसके पास की कुर्सी पर मीटिंग की फ़ाइलें रखी थीं। वह मोबाइल पर कुछ देख ही रहा था कि दरवाज़ा खटखटाया गया। “सर, रूम सर्विस।” नीरज ने दरवाज़ा खोला। सामने होटल का मैनेजर खड़ा था। “सर, माफ़ कीजिए — आपके साथ वाली मैडम का एसी खराब हो गया है। दूसरा रूम खाली नहीं है अभी। अगर आप चाहें तो उन्हें स्पेशल रूम में कुछ देर आराम करने के लिए भेज दें — दो घंटे में रिपेयर हो जाएगा।” नीरज कुछ सोचता, उससे पहले ही बोला, “सर, मैडम कह रहीं थीं कि आप साथ के हैं। तो हमने सोचा पूछ लें…” नीरज ने मुस्कराते हुए सिर हिलाया, “हाँ-हाँ, भेज दीजिए। हम साथ के हैं। यहीं बैठे हैं।” कुछ मिनट बाद दरवाज़ा खुला। नर्म, नीली सूती कुर्ते में वो आई — संजना। बाल खुले नहीं थे, बंधे थे — लेकिन चेहरा खुला था। “Disturb तो नहीं कर रही? ” “नहीं, एसी तुम लेकर नहीं आई हो, तुमसे क्यों नाराज़ होऊँ? ” नीरज ने मज़ाक में कहा। संजना हँसी नहीं, बस मुस्करा दी। “कह रहे थे, दो घंटे में हो जाएगा… तब तक तुम्हारे रूम में थोड़ा ठंडी हो लूँ।” “बैठो न, ” नीरज ने...