नीरज कमरे में बैठा था। एसी की ठंडी हवा चल रही थी, कमरे में हल्की पीली लाइट थी, और उसके पास की कुर्सी पर मीटिंग की फ़ाइलें रखी थीं। वह मोबाइल पर कुछ देख ही रहा था कि दरवाज़ा खटखटाया गया।
“सर, रूम सर्विस।” नीरज ने दरवाज़ा खोला। सामने होटल का मैनेजर खड़ा था।
“सर, माफ़ कीजिए — आपके साथ वाली मैडम का एसी खराब हो गया है। दूसरा रूम खाली नहीं है अभी। अगर आप चाहें तो उन्हें स्पेशल रूम में कुछ देर आराम करने के लिए भेज दें — दो घंटे में रिपेयर हो जाएगा।” नीरज कुछ सोचता, उससे पहले ही बोला, “सर, मैडम कह रहीं थीं कि आप साथ के हैं। तो हमने सोचा पूछ लें…” नीरज ने मुस्कराते हुए सिर हिलाया, “हाँ-हाँ, भेज दीजिए। हम साथ के हैं। यहीं बैठे हैं।”
कुछ मिनट बाद दरवाज़ा खुला। नर्म, नीली सूती कुर्ते में वो आई — संजना। बाल खुले नहीं थे, बंधे थे — लेकिन चेहरा खुला था। “Disturb तो नहीं कर रही?” “नहीं, एसी तुम लेकर नहीं आई हो, तुमसे क्यों नाराज़ होऊँ?” नीरज ने मज़ाक में कहा। संजना हँसी नहीं, बस मुस्करा दी। “कह रहे थे, दो घंटे में हो जाएगा… तब तक तुम्हारे रूम में थोड़ा ठंडी हो लूँ।” “बैठो न,” नीरज ने कहा, “बिस्तर ही है अभी यहाँ।” “हूँ,” संजना बैठ गई — किनारे पर, हाथ पीछे टेकते हुए।
नीरज ने पानी दिया, और बात निकली — “आज मीटिंग में वो क्लाइंट वाला मुद्दा तुमने बहुत सलीके से संभाल लिया था।” “कभी-कभी मुझे लगता है, तुम जान-बूझकर गड़बड़ करते हो, ताकि मैं चमक जाऊँ।” “हो सकता है,” नीरज ने नज़र मिलाकर कहा, “या फिर मुझे तुम्हें देखते रहना अच्छा लगता है जब तुम गुस्से में बोलती हो…” संजना ने तकिए की ओर देखा। “तुम हर बात को flirt में कैसे बदल लेते हो?” “अच्छा,” नीरज थोड़ा आगे खिसक कर बैठ गया। “एक सीन सोचो — अगर मैं इसी बिस्तर पर हूँ… और मेरी बीवी का वीडियो कॉल आ जाए, तो?” संजना ने बिना झिझक कहा, “कुछ नहीं होगा। हमारे यहाँ ये सब नहीं देखा जाता। देखने वाले खुद समझते हैं कि क्या देखा जाए, क्या नहीं।”
अभी उनकी आँखें फिर से मिली ही थीं कि संजना का फोन बज उठा। स्क्रीन पर नाम था — "अमित (पति)" वो चौंकी नहीं, लेकिन उठ खड़ी हुई। फोन उठाया। "हाँ?" दूसरी तरफ़ से आवाज़ तेज़ थी — “कहाँ हो तुम? इतने दिन हो गए एक कॉल ढंग से नहीं आता! क्या ऑफिस ही तुम्हारा घर है अब?” संजना कुछ देर सुनती रही। चेहरा फीका पड़ा। आवाज़ धीमी हुई, और फिर बस “ठीक है…” कहकर फोन कट कर दिया। कमरे की गर्मी एकदम गिर गई। “सॉरी, मैं ज़रा... अपने रूम से होकर आती हूँ।” कहकर वो निकल गई। दरवाज़ा धीरे से बंद हुआ।
नीरज अकेला बैठा रहा। कंधे पर शॉल लिया, फिर वापस रख दिया। थोड़ी देर बाद, बोतल की ढक्कन खोली — एक पैग निकाला, गिलास में डाला। पास में पेप्सी की बोतल थी, उसने सोचा — “चलो इसे ही डाल देते हैं, मिक्सर है…” गिलास रखा ही था कि दरवाज़ा फिर से खटखटाया। वो उठा, खोला। संजना सामने थी — काली साटन नाइटी, हल्का सा सिंदूर, गले में महीन-सा चेन, चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं — लेकिन आँखों में वही बात थी जो पहले कमरे की गर्मी में थी। “कहां थी?” नीरज ने पूछा — सवाल था, लेकिन लहज़ा नहीं। “पलट रही थी,” उसने कहा, “अपने आप को। अब जो हूँ, उसी तरह आई हूँ। बोलो — ठंडी हवा में फिर से गरम होना है या नहीं?”
नीरज ने मुस्कराते हुए गिलास उठाया। "पहले ये पी लूँ?" "क्या है?" "बस हल्की पी है — पेग बनाया था, मिक्सर पेप्सी है…" संजना ने बोतल उठाई, सूँघा… फिर ज़ोर से हँसी। "ये पेप्सी नहीं है बे — कोल्ड ड्रिंक की बोतल में शराब रखी थी!" "तो अब क्या होगा?" "अब जो होगा वो दिखेगा नहीं — महसूस होगा।" संजना अब कमरे में थी — काली साटन नाइटी, हल्की सी लिपस्टिक, आँखों में एक लंबा दिन और एक लंबी रात — दोनों की थकावट और उम्मीद लिए हुए। कमरे में एसी की ठंडी हवा चल रही थी, पर नीरज की साँसें थोड़ी गर्म थीं।
"ये पहनने की ज़रूरत नहीं थी," नीरज ने कहा, आवाज़ सधी हुई थी — जैसे किसी मीटिंग में कोई जरूरी बात कह रहा हो। "ज़रूरत मैंने नहीं देखी," संजना ने धीरे से जवाब दिया, "बस लगा कि अब कमरे में हवा ठंडी हो चुकी है — खुद को हल्का करना चाहिए।" दोनों बैठे — बिस्तर पर नहीं, उसके पास। नीरज ने गिलास उसकी ओर बढ़ाया, "थोड़ा-सा ही है।" "थोड़ा-सा बहुत होता है कभी-कभी," संजना ने गिलास लिया — गर्दन हल्की झुकी, नाइटी की काली साटन की परतें मोड़ बनाती गईं — लेकिन वो बैठे रहने की तहज़ीब में रही।
"तुम हमेशा से ऐसे ही थे?" संजना ने पूछा। "कैसे?" नीरज ने देखा नहीं — महसूस करते हुए जवाब दिया। "धीरे बोलने वाले, लेकिन सोच गहरी। कम कहते हो, ज़्यादा महसूस करवाते हो। अब समझ आता है कि क्यों सब तुम्हारे साथ टूर पर आना चाहते हैं।" नीरज मुस्कराया। "तुम तो आई हो… अब जाना चाहोगी?" "तुम्हारे कमरे से?" "नहीं, उस जगह से जहाँ हम दोनों अब तक थे — ऑफिस, टेबल, मीटिंग्स, कैलेंडर…" संजना चुप रही। फिर बोली — "मुझे नहीं लगता अब हम वहीं हैं। कम से कम आज रात नहीं।"
दोनों के बीच अब कोई पर्दा नहीं था — न ओहदे का, न उम्र का, न समझ का। बस एक दूरी थी — जो अब संकोच नहीं, इज़्ज़त से बनी थी। "बिस्तर पर बैठ जाऊँ?" संजना ने पूछा। "अगर मन कहे, तो पूछना कैसा?" नीरज ने कहा। वो उठी, बिस्तर पर आकर बैठी, उस जगह नहीं जहाँ वो सोने के लिए बैठते हैं — उस जगह जहाँ थोड़ी देर ठहरते हैं, खुद को खोलने से पहले। नीरज ने धीरे से तकिया ठीक किया, जैसे आदत हो किसी और के लिए जगह बनाना। "तुम्हारी बीवी सच में नहीं कॉल करेगी?" संजना ने मुस्कराते हुए पूछा। "शायद मैं ही न उठाऊँ अब," नीरज ने कहा, "कुछ बातें जवाब माँगती हैं, कुछ मौन। आज का मौन तुम्हारे साथ बाँटना चाहता हूँ।"
कमरे में घड़ी टिक-टिक कर रही थी। बाहर होटल के कॉरिडोर की हल्की आवाजें अब दूर लग रही थीं। "क्या हो रहा है हमारे बीच?" संजना ने पूछा — बहुत धीरे। नीरज ने उसकी ओर देखा, "कुछ नहीं। बस... एक ऐसी रात बीत रही है, जो शायद हमें फिर से वो बना दे — जो हम कभी बनने की हिम्मत नहीं कर पाए।" संजना की उंगलियाँ अब तकिए की सिलाई पर चल रही थीं। नीरज की आँखें उसकी उंगलियों पर — और फिर उसकी आँखों पर आकर रुक गईं। "क्या मैं…?" नीरज ने पूछा नहीं — सिर्फ पास खिसक गया।
कमरे में नीरज ने धीमे से पूछा, “तुम्हारा पति तो बहुत अच्छा है न… सब देता है, ख्याल भी रखता है। कम से कम बाहर से तो यही दिखता है।” संजना ने उसकी ओर देखा। चेहरे पर कोई बदलाव नहीं था, पर आँखें थोड़ी धीमी हो गईं — जैसे कोई गहरी बात अब उठने वाली हो। थोड़ी देर वो चुप रही, फिर हल्के से कहा, “ख्याल और ‘सब’... हाँ, मिलते हैं। पर जो चीज़ ‘मिलती’ है, वो जरूरी नहीं कि दे दी गई हो।” नीरज ने सवालिया निगाह से देखा। संजना ने धीरे से अपनी नाइटी की डोरी को एक तरफ खिसकाया — ज़रा भी दिखावा नहीं, कोई शर्म नहीं — बस सच्चाई। वह मुड़ी, पीठ उसकी ओर हुई।
नीरज ने देखा — पीठ पर पुराने निशान थे। कुछ गोल, जैसे सिगरेट से दागे गए हों, कुछ लंबवत खरोंचें, कुछ हल्की, कुछ अब भी गहरे भूरे रंग की। “ये है प्रेम की सच्चाई,” संजना ने बिना भाव बदले कहा। “सिंदूर रोज़ लगता है, लेकिन इन निशानों पर कभी कुछ नहीं रखा गया। ना दवा, ना बहाना।” कमरे की हवा एकदम भारी हो गई। नीरज की साँसें रुक-सी गईं। उसे समझ नहीं आया कि क्या कहे, क्या करे। बस एक काम किया — धीरे से गिलास उठाया, बिना कुछ बोले जाम एक ही घूँट में गले के नीचे उतार दिया। कड़वाहट भीतर तक भर गई।
थोड़ी देर बाद उसने दूसरा गिलास उठाया, लेकिन जैसे ही उसने मूव किया, हाथ काँप गया — और गिलास का आधा हिस्सा संजना के सीने पर छलक गया। शराब की गीली धार नाइटी के ऊपर से बहती हुई नीचे गई। संजना चौंकी नहीं, बस पल भर को अपनी साँस थामी। नीरज हड़बड़ाया। "सॉरी… मैं… मैं… साफ कर दूँ?" संजना ने उसकी आँखों में देखा, कुछ नहीं कहा। नीरज ने टिशू उठाया, हाथ बढ़ाया, धीरे से नाइटी के उस हिस्से पर टिशू रखा। लेकिन हाथ जैसे अपनी दिशा भूल गया। उसकी उँगलियाँ संजना के स्तन से छू गईं। कोई झटका नहीं था — बस वो पल इतना गहरा था कि नीरज खुद झटके में आ गया। उसने फौरन हाथ पीछे खींचा, जैसे किसी सजीव चीज़ को अनजाने में चोट दे दी हो। चेहरा उसका पीला पड़ गया, आँखें ज़मीन पर टिक गईं, जैसे उसने कोई सीमा लांघ दी हो। कमरे में सन्नाटा पसरा था। बहुत धीमा, बहुत भारी।
संजना ने थोड़ी देर उसे देखा, फिर हल्के से मुस्कराई — वो मुस्कान जिसमें कोई मस्ती नहीं थी, बस एक मानवीय अपनापन था। उसने धीरे से सिर झुकाया, नीरज के पास आई, फिर हल्के स्वर में बोली — “क्या हुआ… करंट लगा क्या?” संजना की ये बात कमरे में एक पल को हँसी बनकर आई, लेकिन उसकी आँखें अब भी उदास चमक से भरी थीं। नीरज ने सिर झुका लिया, हल्की मुस्कराहट आई, पर वो हँसी नहीं थी — एक शर्म, एक सच का स्वीकार था।
संजना पास आकर बैठ गई, उसकी तरफ़ पीठ नहीं — सीधा सामना करती हुई। धीरे से बोली, “जानते हो इसमें इतनी आग क्यों थी?” “क्यों?” नीरज ने धीमे से पूछा। “क्योंकि… बुझाने वाला कोई नहीं था। जिस चीज़ को छुआ नहीं जाता, वो जलती रहती है। शरीर की आग अगर समय पर बुझाई न जाए, तो वो आत्मा को राख बना देती है।” कमरे में हवा चल रही थी — पर उस वक़्त उस हवा में भी एक धूप का असर था। “सब कहते हैं प्यार ज़रूरी है,” संजना बोलती गई, “पर कोई नहीं कहता कि स्पर्श भी उतना ही ज़रूरी है। तुम चाहो, कहो, ख्याल रखो — लेकिन जब तक एक शरीर, दूसरे शरीर की भूख नहीं समझता… तब तक रिश्ता सिर्फ सहना बन जाता है।”
नीरज की आँखें अब उसकी बातों में डूबने लगीं थीं — वो सुन रहा था — जैसे कोई पहली बार बोलने की इजाज़त पा गया हो। संजना आगे बोली, “ये जो आजकल सब कहते हैं न — ‘Emotional connection’, ‘Understanding’, ‘Compatibility’ — सब ठीक है। लेकिन जिस घर में देह सो जाती है, वहाँ कुछ भी ज़िंदा नहीं रहता। ना नज़रें, ना रिश्ते, ना ज़ुबान।” वो आगे झुकी, नीरज के हाथ पर अपना हाथ रखा। “मुझे किसी का साथ नहीं चाहिए था। बस कोई ऐसा चाहिए था जो मेरे ज़ख़्म देख सके, और छूने से डरे नहीं।” नीरज ने उसका हाथ धीरे से अपनी पकड़ में लिया — इस बार बिना हिचक के। “तुमने आज कुछ महसूस किया?” संजना ने पूछा। “हाँ,” नीरज ने कहा, “कि अब तक मैं समझता था कि तुम जैसी औरत को कोई छू नहीं सकता... अब समझ में आया, कि कोई छूता नहीं, इसलिए तुम इतनी जलती हो।”
संजना की आँखें भीग गईं, पर आँसू नहीं गिरे। वो बोली — “कभी-कभी एक रात भी किसी की पूरी उम्र का इलाज बन जाती है।” फिर वह थोड़ी देर चुप रही, और एक वाक्य बोला — धीमा, थका हुआ, लेकिन सबसे सच्चा — “मैं किसी के लिए सौंदर्य नहीं, अब सिर्फ ज़रूरत बनना चाहती हूँ।” नीरज ने अब धीरे से उसका चेहरा अपने हाथों में लिया — कोई उत्तेजना नहीं थी वहाँ, बस एक गहराई थी जो कह रही थी — “मैं अब बचाना नहीं चाहता, बस होना चाहता हूँ, तुम्हारे साथ।”
“आज... मेरी प्यास बुझाओगे?” यह वाक्य संजना ने कहा था — लेकिन जैसे वह नीरज से नहीं, अपने ही भीतर से पूछ रही थी। नीरज ने उसकी आँखों में देखा — वहाँ सवाल नहीं था, बस वक़्त पर पहुँची एक अनुमति थी। उसने सिर हिलाया — बिना शब्दों के, बिना हड़बड़ी के। वह पहले उसके बालों के पास झुका — एक चुम्बन उसकी मांग के पास, फिर माथे पर। "क्योंकि प्यास बुझाने से पहले, ज़रूरी है — जल को महसूस करना," उसने धीरे से कहा।
नीरज की हथेली अब उसके चेहरे से होती हुई गर्दन के पिछले हिस्से तक पहुँची — ग्रीवा। उसने वहाँ हल्के-हल्के उंगलियाँ फेरीं — जैसे कोई सोई नसें जगा रहा हो। संजना ने गर्दन थोड़ी झुका दी — आधी स्वीकृति, आधा समर्पण। नीरज ने अपनी नाक उसकी गर्दन पर फेरी, और लंबी, धीमी साँस ली। फिर उसकी उंगलियाँ कंधों से नीचे फिसलती हुई स्तनों तक पहुँचीं। “इन्हें देखता नहीं,” वो बोला, “ये समझे जाते हैं।” उसने हथेलियाँ स्तनों पर रखीं — पूरा आवरण, लेकिन कोई ज़ोर नहीं। “आज तक इन स्तनों को कभी इतने प्रेम और संवेदना से छुआ नहीं गया…” संजना की आवाज़ काँपी। “इन्हें हमेशा बस मसला गया — जैसे जूते से पत्थर।” नीरज ने हल्के दबाव से स्तनों को घेरा, फिर निप्पल के चारों ओर जीभ फेरी — गोल-गोल, फिर बीच में बहुत हल्का चुम्बन। दूसरे स्तन पर वह थोड़ी देर ठहरा — एक हाथ की उंगलियाँ वहां की गोलाई पर चल रही थीं, दूसरे हाथ से वह संजना की पीठ सहला रहा था। “तुम्اره ये स्तन… शब्द नहीं हैं,” उसने कहा, “ये तो पूरी कविता हैं, जो आज तक किसी ने बिना फाड़े पढ़ी ही नहीं।” संजना ने उसके सिर को अपनी छाती में दबा लिया — जैसे अब ये उसकी सबसे सुरक्षित जगह हो।
नीरज अब नीचे सरका। उसकी उंगलियाँ संजना की नाभि की ओर बढ़ीं। उसने वहाँ एक चुंबन रखा — गोलाई में जीभ फिराई, फिर बिल्कुल बीच में एक टिकती हुई गर्म साँस छोड़ी। संजना की कमर ने हरकत की। नीरज ने दोनों हाथ उसके किनारों पर रखे — जैसे कोई नदी के दोनों किनारों को थामे हुए बीच की धारा में बह रहा हो। “यह कमर…” वह बोला, “कभी थामने के लिए थी — न कि धकेलने के लिए।” अब उसका चेहरा और नीचे गया — जाँघों तक। संजना की टाँगें हल्के से खुली हुई थीं — कोई आग्रह नहीं, कोई रोक नहीं। उसने बाहरी जाँघ पर एक लंबा चुम्बन रखा, फिर भीतर की ओर आया — वहाँ जहाँ त्वचा सबसे नर्म, और स्पर्श सबसे तीव्र होता है। नीरज की उंगलियाँ अब जाँघों के बीच पहुँचीं — न कोई घुसपैठ, बस हाथ का एक टिकना, जैसे कोई कह रहा हो: "मैं यहाँ हूँ, लेकिन जब तक तुम न कहो, मैं भीतर नहीं आऊँगा।" संजना की साँस अब तेज़ थी — लेकिन कोई हड़बड़ी नहीं थी। उसने खुद नीरज की कलाई पकड़ी, हथेली को थोड़ी और अपनी ओर सरकाया। “अब देर मत करो…” उसने कहा, “क्योंकि अब जो जगा है, वो नींद नहीं माँगता — सिर्फ तुम।”
“हमें अभी और जलाओ…” संजना की आवाज़ में अब कोई होश नहीं था। “बुझाओ मत ये आग… आज तो मसल कर रख दो हमें… पल-पल जलाया है शरीर को, अब जी भर के जलना है — तेरे हाथों…” नीरज ने उसकी कमर को खींचा, वह उसके सीने से लिपट गई, जैसे कोई भूखी देह बरसों बाद अपना खाना पहचान गई हो। “20 साल से ये अंग मार खा रहे हैं…” संजना की आवाज़ काँप रही थी, “हर बार कोई ज़ोर से आया, कोई ज़रूरत से आया… आज कोई आया है जो… चाहत से आया है।” नीरज उसके स्तनों को अपनी हथेलियों में भर चुका था, पर वह हँस पड़ी — “उठा मत… खा इनको… हर दिन ये ज़बरदस्ती में दबे हैं, आज दबाना नहीं, चूस के छोड़ दे… जैसे यही तेरा आख़िरी घूँट हो!”
उसकी साँसें अब लड़खड़ा रही थीं, और देह — बिल्कुल पेशकश जैसी खुली हुई। “ये जाँघें देख रहा है?” उसने कहा, “ये हर बार फैली थीं, बस डर के मारे… आज फैली हैं तुझे निगलने के लिए… जा, खो जा इसमें, इ इतना कि मुझे ढूँढना पड़े तुझमें…” नीरज नीचे गया, उसकी जाँघों के बीच साँसें रखीं, और संजना ने जैसे अपनी आवाज़ ही खो दी। “अब बोल मत तू…” वह फुसफुसाई, “तेरी जीभ ही बोलने दे, हर जगह — मेरी नाभि बोले, मेरी कमर हँसे, मेरी पीठ तेरे नाखून माँगे…” वह काँप रही थी — देह अब पिघल रही थी। “मुझे मत छू सिर्फ… हर अंग को तेरी मौजूदगी चाहिए। जब तू मेरे स्तनों पर हो, मेरी जाँघें जलें — जब तू नाभि के पास हो, मेरी गर्दन तड़पे — हर हिस्सा पूछे, *‘अब तू यहाँ कब आएगा?’”
नीरज ने उसकी पीठ पर नाखून खींचा, संजना ने चीखने जैसी सिसकी ली — “हाँ… ऐसे ही… इज़्ज़त नहीं चाहिए मुझे, मैं इज़्ज़त में सड़ गई हूँ… बेइज़्ज़ती में पहली बार — इंसान लग रही हूँ।” अब उनके बीच कोई भाषा नहीं बची थी — सिर्फ वो बदन थे, जो अब पहली बार अपना वजूद माँग रहे थे। नीरज ने उसका चेहरा पकड़ा, उसके होठों को इतनी गहराई से चूमा, कि वह साँस छोड़ते-छोड़ते उसके भीतर उतर गई। और जैसे ही वो उतरी — कुछ टूटा, कुछ खुला, कुछ फटा…
“रुको मत… अब नहीं!” संजना की आवाज़ अब फुसफुसाहट नहीं, पागलपन बन चुकी थी। “जैसे तू आया है न… वैसे कोई नहीं आया मेरे पास — अब एक बार नहीं… हर बार घुस जा… हर अंदाज़ में… हर तरफ़ से!” नीरज ने उसकी टांगें और फैलाईं — बिल्कुल खोलकर, जैसे कोई दरवाज़ा अब कभी बंद नहीं होगा। उसने एक बार तेज़ घुसा — संजना चीखी नहीं, हँसी… जैसे कोई पहली बार सच में जागा हो। “हाँ… ऐसे… ऐसे घुस…” उसने खुद नीचे से कमर उठाई, “तेरे आने से पहले मैं खाली थी… अब तू अंदर है तो मैं पूरी लग रही हूँ!” अब नीरज ने उसकी पीठ मोड़कर, उसकी पीठ से चिपकते हुए पीछे से लिया। उसने कमर पकड़ी, कसा… और भीतर से फिर उतना ही तेज़। संजना अब काँप रही थी — “मेरी रीढ़ हिल रही है… जैसे तू मेरी हड्डियों तक उतर गया है।”
अब वह उल्टी हुई — पीठ के बल। नीरज ऊपर से झुका — स्तनों को अपने मुँह में लिया — एक बार में दोनों, बारी-बारी नहीं — जैसे वो खुद दूध पीता बच्चा बन गया हो। “ये लो… ये मेरे हैं!” संजना चिल्लाई, “20 साल तक जो सिर्फ मसलते रहे — आज तू चूस… खींच… निचोड़… मेरे हर अंग को तेरा नाम चाहिए आज रात!” नीरज ने उसकी जाँघें अपने कंधों पर रखीं — और ज़ोर से एक और धक्का दिया। "मैं फट रही हूँ…" वो बोली, "फिर भी रुक मत — क्योंकि ये फटना मेरे अंदर की मौत का जन्म है!" अब वह पलंग पर नहीं — ज्वालामुखी के मुहाने पर थी। नीरज ने अपने दाँतों से उसकी पीठ काटी — "ऐसे… दर्द भी दो — अब दर्द से डर नहीं लगता… तेरे छूने से तो जले भी मीठे लगते हैं!”
अब वो दोनों एक लय में हिल रहे थे — पलंग चरमरा रहा था, कमरा गर्म नहीं — तप रहा था। एक हाथ स्तन पर, दूसरा कमर में, और होंठ — गर्दन, पीठ, पेट सब जगह थककर गिरे जा रहे थे। “अब आऊँ?” नीरज ने पूछा — "पूरा?" संजना ने दोनों टाँगें उसके चारों ओर लपेट लीं — जैसे कोई सांप अपने शिकार को घेरता है। "हाँ… आ… और ऐसे आ कि मैं तेरे साथ बिखर जाऊँ!" और फिर — ज्वालामुखी फटा। उसके साथ संजना की चीख नहीं — एक हूक निकली। शरीर हिल गया, साँसें जैसे कहीं और चली गईं। आँखें खुली थीं — पर देख कुछ नहीं रही थीं। बस एक वाक्य निकला — "अब मैं ज़िंदा हूँ…"
संजना चुपचाप लेटी थी। नीरज की छाती पर उँगली से कुछ गोल घुमा रही थी। थोड़ी देर बाद बोली — "देख नीरज, मैं कोई तुम्हारी बीवी का हक नहीं छीनना चाहती। वो है, उसका हक है — तू रोज़ उसी का है।" फिर मुस्कराकर बोली, "मैं बस सफर हूँ... थोड़ी देर का बिस्तर, जहाँ तू रुका… आराम किया… और फिर चल पड़ा। बस इतना ही, ठीक?" नीरज कुछ बोलने ही वाला था, लेकिन संजना ने उसे हाथ से रोका — "नहीं नहीं, कुछ मत बोल, बस सुन।"
वो उठी नहीं, बस पीठ सीधी की और चादर नीचे सरका दी। उसके नग्न स्तन बाहर थे — हल्के पसीने से भीगे हुए, थके, लेकिन अब भी गर्म। उसने अपने दोनों हाथों से धीरे-धीरे स्तनों को पकड़ लिया। "यही हैं न तेरे फेवरेट? यहीं सबसे ज़्यादा टिके थे तू? अब देख…" उसने हल्के से दाएँ को मसलना शुरू किया। "ये बोल रहा है — फिर से दबा, फिर से चूस, जैसे रात को कर रहा था।" नीरज बस देख रहा था। फिर संजना ने बाएँ को हल्के से ऊपर उठाया — "और ये बोल रहा है — मेरी बारी कब आएगी बे?" वो हँसी, खुद पे हँसी — लेकिन आवाज़ में एक अलग सा जलन और बुलावा था। "ये ना, अब भी तुझे याद कर रहे हैं… अब भी तुझे ढूँढ रहे हैं — क्योंकि जो तूने किया, वो किसी ने नहीं किया।" उसने धीरे-धीरे दोनों स्तनों को अपनी हथेलियों से मसलना शुरू किया — बहुत नर्मी से, लेकिन लगातार। "देख, मैं खुद कर रही हूँ, ताकि तुझे याद रहे कि ये तेरे थे… और रहेंगे… चाहे तू आ ना पाए।" उसकी साँसें हल्की-हल्की चल रही थीं, होठों पर एक सीधी सी मुस्कान। "अब मत आना पास… बस देख… आँखों से छू ले… और इस पल को रख ले अपनी किसी थकी हुई रात के लिए।"
संजना ने चादर फिर से ओढ़ ली। नीरज की तरफ झुकी — उसके होठों को चूमा, बहुत धीरे। “चलो अब... वरना दिल बोलेगा, फिर से एक बार और…” नीरज ने हँसते हुए कहा — “बोले तो बोले… दिल का तो काम ही है मचलना।” संजना ने उसकी नाक खींची — “अरे तू तो छोड़ेगा भी नहीं न… देख, तू अब भी मेरी जाँघ पर हाथ रखे बैठा है।” नीरज और पास खिसका, हाथ जाँघ से पीठ तक सरका दिया — “देख रहा हूँ, सब याद कर लूँ… ताकि कल को भूल न जाऊँ कि ये बदन कितना प्यारा था।”
संजना उठी, धीरे से कपड़े पहनने लगी। नीरज ने पीछे से झुक कर उसकी कमर में होंठ रख दिए। “चलने से पहले थोड़ा और चख लूँ? कमर बोली, 'मुझे बिना चूमें ये कैसे चला जाएगा?'” संजना मुस्कराई — “तू न बस बहाना ढूँढता है छूने का।” “तो तू बदन नहीं है क्या? ट्रेन की याद बन गई है — जिसमें मैं हर स्टेशन पर हाथ फेरता चल रहा हूँ।” अब वो दरवाजे की तरफ बढ़ने लगे — धीरे-धीरे, शरीर तो चल रहा था, पर उंगलियाँ अब भी एक-दूसरे के गाल, गर्दन, उंगलियाँ और पीठ को छू रही थीं। दरवाज़ा खुला, संजना बाहर निकली — और जाते-जाते फुसफुसाई: “मैं चल रही हूँ, लेकिन मेरी खुशबू… तेरे तकिए में रह जाएगी।” नीरज बोला: “और मेरी उंगलियाँ… तेरे स्तनों की याद में हमेशा काँपती रहेंगी।” दरवाज़ा बंद हुआ। कमरे में ख़ामोशी रह गई — पर बिस्तर की चादर अब भी प्यार से भीगी थी।
कुछ मिनट बाद दरवाज़ा खुला। नर्म, नीली सूती कुर्ते में वो आई — संजना। बाल खुले नहीं थे, बंधे थे — लेकिन चेहरा खुला था। “Disturb तो नहीं कर रही?” “नहीं, एसी तुम लेकर नहीं आई हो, तुमसे क्यों नाराज़ होऊँ?” नीरज ने मज़ाक में कहा। संजना हँसी नहीं, बस मुस्करा दी। “कह रहे थे, दो घंटे में हो जाएगा… तब तक तुम्हारे रूम में थोड़ा ठंडी हो लूँ।” “बैठो न,” नीरज ने कहा, “बिस्तर ही है अभी यहाँ।” “हूँ,” संजना बैठ गई — किनारे पर, हाथ पीछे टेकते हुए।
नीरज ने पानी दिया, और बात निकली — “आज मीटिंग में वो क्लाइंट वाला मुद्दा तुमने बहुत सलीके से संभाल लिया था।” “कभी-कभी मुझे लगता है, तुम जान-बूझकर गड़बड़ करते हो, ताकि मैं चमक जाऊँ।” “हो सकता है,” नीरज ने नज़र मिलाकर कहा, “या फिर मुझे तुम्हें देखते रहना अच्छा लगता है जब तुम गुस्से में बोलती हो…” संजना ने तकिए की ओर देखा। “तुम हर बात को flirt में कैसे बदल लेते हो?” “अच्छा,” नीरज थोड़ा आगे खिसक कर बैठ गया। “एक सीन सोचो — अगर मैं इसी बिस्तर पर हूँ… और मेरी बीवी का वीडियो कॉल आ जाए, तो?” संजना ने बिना झिझक कहा, “कुछ नहीं होगा। हमारे यहाँ ये सब नहीं देखा जाता। देखने वाले खुद समझते हैं कि क्या देखा जाए, क्या नहीं।”
अभी उनकी आँखें फिर से मिली ही थीं कि संजना का फोन बज उठा। स्क्रीन पर नाम था — "अमित (पति)" वो चौंकी नहीं, लेकिन उठ खड़ी हुई। फोन उठाया। "हाँ?" दूसरी तरफ़ से आवाज़ तेज़ थी — “कहाँ हो तुम? इतने दिन हो गए एक कॉल ढंग से नहीं आता! क्या ऑफिस ही तुम्हारा घर है अब?” संजना कुछ देर सुनती रही। चेहरा फीका पड़ा। आवाज़ धीमी हुई, और फिर बस “ठीक है…” कहकर फोन कट कर दिया। कमरे की गर्मी एकदम गिर गई। “सॉरी, मैं ज़रा... अपने रूम से होकर आती हूँ।” कहकर वो निकल गई। दरवाज़ा धीरे से बंद हुआ।
नीरज अकेला बैठा रहा। कंधे पर शॉल लिया, फिर वापस रख दिया। थोड़ी देर बाद, बोतल की ढक्कन खोली — एक पैग निकाला, गिलास में डाला। पास में पेप्सी की बोतल थी, उसने सोचा — “चलो इसे ही डाल देते हैं, मिक्सर है…” गिलास रखा ही था कि दरवाज़ा फिर से खटखटाया। वो उठा, खोला। संजना सामने थी — काली साटन नाइटी, हल्का सा सिंदूर, गले में महीन-सा चेन, चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं — लेकिन आँखों में वही बात थी जो पहले कमरे की गर्मी में थी। “कहां थी?” नीरज ने पूछा — सवाल था, लेकिन लहज़ा नहीं। “पलट रही थी,” उसने कहा, “अपने आप को। अब जो हूँ, उसी तरह आई हूँ। बोलो — ठंडी हवा में फिर से गरम होना है या नहीं?”
नीरज ने मुस्कराते हुए गिलास उठाया। "पहले ये पी लूँ?" "क्या है?" "बस हल्की पी है — पेग बनाया था, मिक्सर पेप्सी है…" संजना ने बोतल उठाई, सूँघा… फिर ज़ोर से हँसी। "ये पेप्सी नहीं है बे — कोल्ड ड्रिंक की बोतल में शराब रखी थी!" "तो अब क्या होगा?" "अब जो होगा वो दिखेगा नहीं — महसूस होगा।" संजना अब कमरे में थी — काली साटन नाइटी, हल्की सी लिपस्टिक, आँखों में एक लंबा दिन और एक लंबी रात — दोनों की थकावट और उम्मीद लिए हुए। कमरे में एसी की ठंडी हवा चल रही थी, पर नीरज की साँसें थोड़ी गर्म थीं।
"ये पहनने की ज़रूरत नहीं थी," नीरज ने कहा, आवाज़ सधी हुई थी — जैसे किसी मीटिंग में कोई जरूरी बात कह रहा हो। "ज़रूरत मैंने नहीं देखी," संजना ने धीरे से जवाब दिया, "बस लगा कि अब कमरे में हवा ठंडी हो चुकी है — खुद को हल्का करना चाहिए।" दोनों बैठे — बिस्तर पर नहीं, उसके पास। नीरज ने गिलास उसकी ओर बढ़ाया, "थोड़ा-सा ही है।" "थोड़ा-सा बहुत होता है कभी-कभी," संजना ने गिलास लिया — गर्दन हल्की झुकी, नाइटी की काली साटन की परतें मोड़ बनाती गईं — लेकिन वो बैठे रहने की तहज़ीब में रही।
"तुम हमेशा से ऐसे ही थे?" संजना ने पूछा। "कैसे?" नीरज ने देखा नहीं — महसूस करते हुए जवाब दिया। "धीरे बोलने वाले, लेकिन सोच गहरी। कम कहते हो, ज़्यादा महसूस करवाते हो। अब समझ आता है कि क्यों सब तुम्हारे साथ टूर पर आना चाहते हैं।" नीरज मुस्कराया। "तुम तो आई हो… अब जाना चाहोगी?" "तुम्हारे कमरे से?" "नहीं, उस जगह से जहाँ हम दोनों अब तक थे — ऑफिस, टेबल, मीटिंग्स, कैलेंडर…" संजना चुप रही। फिर बोली — "मुझे नहीं लगता अब हम वहीं हैं। कम से कम आज रात नहीं।"
दोनों के बीच अब कोई पर्दा नहीं था — न ओहदे का, न उम्र का, न समझ का। बस एक दूरी थी — जो अब संकोच नहीं, इज़्ज़त से बनी थी। "बिस्तर पर बैठ जाऊँ?" संजना ने पूछा। "अगर मन कहे, तो पूछना कैसा?" नीरज ने कहा। वो उठी, बिस्तर पर आकर बैठी, उस जगह नहीं जहाँ वो सोने के लिए बैठते हैं — उस जगह जहाँ थोड़ी देर ठहरते हैं, खुद को खोलने से पहले। नीरज ने धीरे से तकिया ठीक किया, जैसे आदत हो किसी और के लिए जगह बनाना। "तुम्हारी बीवी सच में नहीं कॉल करेगी?" संजना ने मुस्कराते हुए पूछा। "शायद मैं ही न उठाऊँ अब," नीरज ने कहा, "कुछ बातें जवाब माँगती हैं, कुछ मौन। आज का मौन तुम्हारे साथ बाँटना चाहता हूँ।"
कमरे में घड़ी टिक-टिक कर रही थी। बाहर होटल के कॉरिडोर की हल्की आवाजें अब दूर लग रही थीं। "क्या हो रहा है हमारे बीच?" संजना ने पूछा — बहुत धीरे। नीरज ने उसकी ओर देखा, "कुछ नहीं। बस... एक ऐसी रात बीत रही है, जो शायद हमें फिर से वो बना दे — जो हम कभी बनने की हिम्मत नहीं कर पाए।" संजना की उंगलियाँ अब तकिए की सिलाई पर चल रही थीं। नीरज की आँखें उसकी उंगलियों पर — और फिर उसकी आँखों पर आकर रुक गईं। "क्या मैं…?" नीरज ने पूछा नहीं — सिर्फ पास खिसक गया।
कमरे में नीरज ने धीमे से पूछा, “तुम्हारा पति तो बहुत अच्छा है न… सब देता है, ख्याल भी रखता है। कम से कम बाहर से तो यही दिखता है।” संजना ने उसकी ओर देखा। चेहरे पर कोई बदलाव नहीं था, पर आँखें थोड़ी धीमी हो गईं — जैसे कोई गहरी बात अब उठने वाली हो। थोड़ी देर वो चुप रही, फिर हल्के से कहा, “ख्याल और ‘सब’... हाँ, मिलते हैं। पर जो चीज़ ‘मिलती’ है, वो जरूरी नहीं कि दे दी गई हो।” नीरज ने सवालिया निगाह से देखा। संजना ने धीरे से अपनी नाइटी की डोरी को एक तरफ खिसकाया — ज़रा भी दिखावा नहीं, कोई शर्म नहीं — बस सच्चाई। वह मुड़ी, पीठ उसकी ओर हुई।
नीरज ने देखा — पीठ पर पुराने निशान थे। कुछ गोल, जैसे सिगरेट से दागे गए हों, कुछ लंबवत खरोंचें, कुछ हल्की, कुछ अब भी गहरे भूरे रंग की। “ये है प्रेम की सच्चाई,” संजना ने बिना भाव बदले कहा। “सिंदूर रोज़ लगता है, लेकिन इन निशानों पर कभी कुछ नहीं रखा गया। ना दवा, ना बहाना।” कमरे की हवा एकदम भारी हो गई। नीरज की साँसें रुक-सी गईं। उसे समझ नहीं आया कि क्या कहे, क्या करे। बस एक काम किया — धीरे से गिलास उठाया, बिना कुछ बोले जाम एक ही घूँट में गले के नीचे उतार दिया। कड़वाहट भीतर तक भर गई।
थोड़ी देर बाद उसने दूसरा गिलास उठाया, लेकिन जैसे ही उसने मूव किया, हाथ काँप गया — और गिलास का आधा हिस्सा संजना के सीने पर छलक गया। शराब की गीली धार नाइटी के ऊपर से बहती हुई नीचे गई। संजना चौंकी नहीं, बस पल भर को अपनी साँस थामी। नीरज हड़बड़ाया। "सॉरी… मैं… मैं… साफ कर दूँ?" संजना ने उसकी आँखों में देखा, कुछ नहीं कहा। नीरज ने टिशू उठाया, हाथ बढ़ाया, धीरे से नाइटी के उस हिस्से पर टिशू रखा। लेकिन हाथ जैसे अपनी दिशा भूल गया। उसकी उँगलियाँ संजना के स्तन से छू गईं। कोई झटका नहीं था — बस वो पल इतना गहरा था कि नीरज खुद झटके में आ गया। उसने फौरन हाथ पीछे खींचा, जैसे किसी सजीव चीज़ को अनजाने में चोट दे दी हो। चेहरा उसका पीला पड़ गया, आँखें ज़मीन पर टिक गईं, जैसे उसने कोई सीमा लांघ दी हो। कमरे में सन्नाटा पसरा था। बहुत धीमा, बहुत भारी।
संजना ने थोड़ी देर उसे देखा, फिर हल्के से मुस्कराई — वो मुस्कान जिसमें कोई मस्ती नहीं थी, बस एक मानवीय अपनापन था। उसने धीरे से सिर झुकाया, नीरज के पास आई, फिर हल्के स्वर में बोली — “क्या हुआ… करंट लगा क्या?” संजना की ये बात कमरे में एक पल को हँसी बनकर आई, लेकिन उसकी आँखें अब भी उदास चमक से भरी थीं। नीरज ने सिर झुका लिया, हल्की मुस्कराहट आई, पर वो हँसी नहीं थी — एक शर्म, एक सच का स्वीकार था।
संजना पास आकर बैठ गई, उसकी तरफ़ पीठ नहीं — सीधा सामना करती हुई। धीरे से बोली, “जानते हो इसमें इतनी आग क्यों थी?” “क्यों?” नीरज ने धीमे से पूछा। “क्योंकि… बुझाने वाला कोई नहीं था। जिस चीज़ को छुआ नहीं जाता, वो जलती रहती है। शरीर की आग अगर समय पर बुझाई न जाए, तो वो आत्मा को राख बना देती है।” कमरे में हवा चल रही थी — पर उस वक़्त उस हवा में भी एक धूप का असर था। “सब कहते हैं प्यार ज़रूरी है,” संजना बोलती गई, “पर कोई नहीं कहता कि स्पर्श भी उतना ही ज़रूरी है। तुम चाहो, कहो, ख्याल रखो — लेकिन जब तक एक शरीर, दूसरे शरीर की भूख नहीं समझता… तब तक रिश्ता सिर्फ सहना बन जाता है।”
नीरज की आँखें अब उसकी बातों में डूबने लगीं थीं — वो सुन रहा था — जैसे कोई पहली बार बोलने की इजाज़त पा गया हो। संजना आगे बोली, “ये जो आजकल सब कहते हैं न — ‘Emotional connection’, ‘Understanding’, ‘Compatibility’ — सब ठीक है। लेकिन जिस घर में देह सो जाती है, वहाँ कुछ भी ज़िंदा नहीं रहता। ना नज़रें, ना रिश्ते, ना ज़ुबान।” वो आगे झुकी, नीरज के हाथ पर अपना हाथ रखा। “मुझे किसी का साथ नहीं चाहिए था। बस कोई ऐसा चाहिए था जो मेरे ज़ख़्म देख सके, और छूने से डरे नहीं।” नीरज ने उसका हाथ धीरे से अपनी पकड़ में लिया — इस बार बिना हिचक के। “तुमने आज कुछ महसूस किया?” संजना ने पूछा। “हाँ,” नीरज ने कहा, “कि अब तक मैं समझता था कि तुम जैसी औरत को कोई छू नहीं सकता... अब समझ में आया, कि कोई छूता नहीं, इसलिए तुम इतनी जलती हो।”
संजना की आँखें भीग गईं, पर आँसू नहीं गिरे। वो बोली — “कभी-कभी एक रात भी किसी की पूरी उम्र का इलाज बन जाती है।” फिर वह थोड़ी देर चुप रही, और एक वाक्य बोला — धीमा, थका हुआ, लेकिन सबसे सच्चा — “मैं किसी के लिए सौंदर्य नहीं, अब सिर्फ ज़रूरत बनना चाहती हूँ।” नीरज ने अब धीरे से उसका चेहरा अपने हाथों में लिया — कोई उत्तेजना नहीं थी वहाँ, बस एक गहराई थी जो कह रही थी — “मैं अब बचाना नहीं चाहता, बस होना चाहता हूँ, तुम्हारे साथ।”
“आज... मेरी प्यास बुझाओगे?” यह वाक्य संजना ने कहा था — लेकिन जैसे वह नीरज से नहीं, अपने ही भीतर से पूछ रही थी। नीरज ने उसकी आँखों में देखा — वहाँ सवाल नहीं था, बस वक़्त पर पहुँची एक अनुमति थी। उसने सिर हिलाया — बिना शब्दों के, बिना हड़बड़ी के। वह पहले उसके बालों के पास झुका — एक चुम्बन उसकी मांग के पास, फिर माथे पर। "क्योंकि प्यास बुझाने से पहले, ज़रूरी है — जल को महसूस करना," उसने धीरे से कहा।
नीरज की हथेली अब उसके चेहरे से होती हुई गर्दन के पिछले हिस्से तक पहुँची — ग्रीवा। उसने वहाँ हल्के-हल्के उंगलियाँ फेरीं — जैसे कोई सोई नसें जगा रहा हो। संजना ने गर्दन थोड़ी झुका दी — आधी स्वीकृति, आधा समर्पण। नीरज ने अपनी नाक उसकी गर्दन पर फेरी, और लंबी, धीमी साँस ली। फिर उसकी उंगलियाँ कंधों से नीचे फिसलती हुई स्तनों तक पहुँचीं। “इन्हें देखता नहीं,” वो बोला, “ये समझे जाते हैं।” उसने हथेलियाँ स्तनों पर रखीं — पूरा आवरण, लेकिन कोई ज़ोर नहीं। “आज तक इन स्तनों को कभी इतने प्रेम और संवेदना से छुआ नहीं गया…” संजना की आवाज़ काँपी। “इन्हें हमेशा बस मसला गया — जैसे जूते से पत्थर।” नीरज ने हल्के दबाव से स्तनों को घेरा, फिर निप्पल के चारों ओर जीभ फेरी — गोल-गोल, फिर बीच में बहुत हल्का चुम्बन। दूसरे स्तन पर वह थोड़ी देर ठहरा — एक हाथ की उंगलियाँ वहां की गोलाई पर चल रही थीं, दूसरे हाथ से वह संजना की पीठ सहला रहा था। “तुम्اره ये स्तन… शब्द नहीं हैं,” उसने कहा, “ये तो पूरी कविता हैं, जो आज तक किसी ने बिना फाड़े पढ़ी ही नहीं।” संजना ने उसके सिर को अपनी छाती में दबा लिया — जैसे अब ये उसकी सबसे सुरक्षित जगह हो।
नीरज अब नीचे सरका। उसकी उंगलियाँ संजना की नाभि की ओर बढ़ीं। उसने वहाँ एक चुंबन रखा — गोलाई में जीभ फिराई, फिर बिल्कुल बीच में एक टिकती हुई गर्म साँस छोड़ी। संजना की कमर ने हरकत की। नीरज ने दोनों हाथ उसके किनारों पर रखे — जैसे कोई नदी के दोनों किनारों को थामे हुए बीच की धारा में बह रहा हो। “यह कमर…” वह बोला, “कभी थामने के लिए थी — न कि धकेलने के लिए।” अब उसका चेहरा और नीचे गया — जाँघों तक। संजना की टाँगें हल्के से खुली हुई थीं — कोई आग्रह नहीं, कोई रोक नहीं। उसने बाहरी जाँघ पर एक लंबा चुम्बन रखा, फिर भीतर की ओर आया — वहाँ जहाँ त्वचा सबसे नर्म, और स्पर्श सबसे तीव्र होता है। नीरज की उंगलियाँ अब जाँघों के बीच पहुँचीं — न कोई घुसपैठ, बस हाथ का एक टिकना, जैसे कोई कह रहा हो: "मैं यहाँ हूँ, लेकिन जब तक तुम न कहो, मैं भीतर नहीं आऊँगा।" संजना की साँस अब तेज़ थी — लेकिन कोई हड़बड़ी नहीं थी। उसने खुद नीरज की कलाई पकड़ी, हथेली को थोड़ी और अपनी ओर सरकाया। “अब देर मत करो…” उसने कहा, “क्योंकि अब जो जगा है, वो नींद नहीं माँगता — सिर्फ तुम।”
“हमें अभी और जलाओ…” संजना की आवाज़ में अब कोई होश नहीं था। “बुझाओ मत ये आग… आज तो मसल कर रख दो हमें… पल-पल जलाया है शरीर को, अब जी भर के जलना है — तेरे हाथों…” नीरज ने उसकी कमर को खींचा, वह उसके सीने से लिपट गई, जैसे कोई भूखी देह बरसों बाद अपना खाना पहचान गई हो। “20 साल से ये अंग मार खा रहे हैं…” संजना की आवाज़ काँप रही थी, “हर बार कोई ज़ोर से आया, कोई ज़रूरत से आया… आज कोई आया है जो… चाहत से आया है।” नीरज उसके स्तनों को अपनी हथेलियों में भर चुका था, पर वह हँस पड़ी — “उठा मत… खा इनको… हर दिन ये ज़बरदस्ती में दबे हैं, आज दबाना नहीं, चूस के छोड़ दे… जैसे यही तेरा आख़िरी घूँट हो!”
उसकी साँसें अब लड़खड़ा रही थीं, और देह — बिल्कुल पेशकश जैसी खुली हुई। “ये जाँघें देख रहा है?” उसने कहा, “ये हर बार फैली थीं, बस डर के मारे… आज फैली हैं तुझे निगलने के लिए… जा, खो जा इसमें, इ इतना कि मुझे ढूँढना पड़े तुझमें…” नीरज नीचे गया, उसकी जाँघों के बीच साँसें रखीं, और संजना ने जैसे अपनी आवाज़ ही खो दी। “अब बोल मत तू…” वह फुसफुसाई, “तेरी जीभ ही बोलने दे, हर जगह — मेरी नाभि बोले, मेरी कमर हँसे, मेरी पीठ तेरे नाखून माँगे…” वह काँप रही थी — देह अब पिघल रही थी। “मुझे मत छू सिर्फ… हर अंग को तेरी मौजूदगी चाहिए। जब तू मेरे स्तनों पर हो, मेरी जाँघें जलें — जब तू नाभि के पास हो, मेरी गर्दन तड़पे — हर हिस्सा पूछे, *‘अब तू यहाँ कब आएगा?’”
नीरज ने उसकी पीठ पर नाखून खींचा, संजना ने चीखने जैसी सिसकी ली — “हाँ… ऐसे ही… इज़्ज़त नहीं चाहिए मुझे, मैं इज़्ज़त में सड़ गई हूँ… बेइज़्ज़ती में पहली बार — इंसान लग रही हूँ।” अब उनके बीच कोई भाषा नहीं बची थी — सिर्फ वो बदन थे, जो अब पहली बार अपना वजूद माँग रहे थे। नीरज ने उसका चेहरा पकड़ा, उसके होठों को इतनी गहराई से चूमा, कि वह साँस छोड़ते-छोड़ते उसके भीतर उतर गई। और जैसे ही वो उतरी — कुछ टूटा, कुछ खुला, कुछ फटा…
“रुको मत… अब नहीं!” संजना की आवाज़ अब फुसफुसाहट नहीं, पागलपन बन चुकी थी। “जैसे तू आया है न… वैसे कोई नहीं आया मेरे पास — अब एक बार नहीं… हर बार घुस जा… हर अंदाज़ में… हर तरफ़ से!” नीरज ने उसकी टांगें और फैलाईं — बिल्कुल खोलकर, जैसे कोई दरवाज़ा अब कभी बंद नहीं होगा। उसने एक बार तेज़ घुसा — संजना चीखी नहीं, हँसी… जैसे कोई पहली बार सच में जागा हो। “हाँ… ऐसे… ऐसे घुस…” उसने खुद नीचे से कमर उठाई, “तेरे आने से पहले मैं खाली थी… अब तू अंदर है तो मैं पूरी लग रही हूँ!” अब नीरज ने उसकी पीठ मोड़कर, उसकी पीठ से चिपकते हुए पीछे से लिया। उसने कमर पकड़ी, कसा… और भीतर से फिर उतना ही तेज़। संजना अब काँप रही थी — “मेरी रीढ़ हिल रही है… जैसे तू मेरी हड्डियों तक उतर गया है।”
अब वह उल्टी हुई — पीठ के बल। नीरज ऊपर से झुका — स्तनों को अपने मुँह में लिया — एक बार में दोनों, बारी-बारी नहीं — जैसे वो खुद दूध पीता बच्चा बन गया हो। “ये लो… ये मेरे हैं!” संजना चिल्लाई, “20 साल तक जो सिर्फ मसलते रहे — आज तू चूस… खींच… निचोड़… मेरे हर अंग को तेरा नाम चाहिए आज रात!” नीरज ने उसकी जाँघें अपने कंधों पर रखीं — और ज़ोर से एक और धक्का दिया। "मैं फट रही हूँ…" वो बोली, "फिर भी रुक मत — क्योंकि ये फटना मेरे अंदर की मौत का जन्म है!" अब वह पलंग पर नहीं — ज्वालामुखी के मुहाने पर थी। नीरज ने अपने दाँतों से उसकी पीठ काटी — "ऐसे… दर्द भी दो — अब दर्द से डर नहीं लगता… तेरे छूने से तो जले भी मीठे लगते हैं!”
अब वो दोनों एक लय में हिल रहे थे — पलंग चरमरा रहा था, कमरा गर्म नहीं — तप रहा था। एक हाथ स्तन पर, दूसरा कमर में, और होंठ — गर्दन, पीठ, पेट सब जगह थककर गिरे जा रहे थे। “अब आऊँ?” नीरज ने पूछा — "पूरा?" संजना ने दोनों टाँगें उसके चारों ओर लपेट लीं — जैसे कोई सांप अपने शिकार को घेरता है। "हाँ… आ… और ऐसे आ कि मैं तेरे साथ बिखर जाऊँ!" और फिर — ज्वालामुखी फटा। उसके साथ संजना की चीख नहीं — एक हूक निकली। शरीर हिल गया, साँसें जैसे कहीं और चली गईं। आँखें खुली थीं — पर देख कुछ नहीं रही थीं। बस एक वाक्य निकला — "अब मैं ज़िंदा हूँ…"
संजना चुपचाप लेटी थी। नीरज की छाती पर उँगली से कुछ गोल घुमा रही थी। थोड़ी देर बाद बोली — "देख नीरज, मैं कोई तुम्हारी बीवी का हक नहीं छीनना चाहती। वो है, उसका हक है — तू रोज़ उसी का है।" फिर मुस्कराकर बोली, "मैं बस सफर हूँ... थोड़ी देर का बिस्तर, जहाँ तू रुका… आराम किया… और फिर चल पड़ा। बस इतना ही, ठीक?" नीरज कुछ बोलने ही वाला था, लेकिन संजना ने उसे हाथ से रोका — "नहीं नहीं, कुछ मत बोल, बस सुन।"
वो उठी नहीं, बस पीठ सीधी की और चादर नीचे सरका दी। उसके नग्न स्तन बाहर थे — हल्के पसीने से भीगे हुए, थके, लेकिन अब भी गर्म। उसने अपने दोनों हाथों से धीरे-धीरे स्तनों को पकड़ लिया। "यही हैं न तेरे फेवरेट? यहीं सबसे ज़्यादा टिके थे तू? अब देख…" उसने हल्के से दाएँ को मसलना शुरू किया। "ये बोल रहा है — फिर से दबा, फिर से चूस, जैसे रात को कर रहा था।" नीरज बस देख रहा था। फिर संजना ने बाएँ को हल्के से ऊपर उठाया — "और ये बोल रहा है — मेरी बारी कब आएगी बे?" वो हँसी, खुद पे हँसी — लेकिन आवाज़ में एक अलग सा जलन और बुलावा था। "ये ना, अब भी तुझे याद कर रहे हैं… अब भी तुझे ढूँढ रहे हैं — क्योंकि जो तूने किया, वो किसी ने नहीं किया।" उसने धीरे-धीरे दोनों स्तनों को अपनी हथेलियों से मसलना शुरू किया — बहुत नर्मी से, लेकिन लगातार। "देख, मैं खुद कर रही हूँ, ताकि तुझे याद रहे कि ये तेरे थे… और रहेंगे… चाहे तू आ ना पाए।" उसकी साँसें हल्की-हल्की चल रही थीं, होठों पर एक सीधी सी मुस्कान। "अब मत आना पास… बस देख… आँखों से छू ले… और इस पल को रख ले अपनी किसी थकी हुई रात के लिए।"
संजना ने चादर फिर से ओढ़ ली। नीरज की तरफ झुकी — उसके होठों को चूमा, बहुत धीरे। “चलो अब... वरना दिल बोलेगा, फिर से एक बार और…” नीरज ने हँसते हुए कहा — “बोले तो बोले… दिल का तो काम ही है मचलना।” संजना ने उसकी नाक खींची — “अरे तू तो छोड़ेगा भी नहीं न… देख, तू अब भी मेरी जाँघ पर हाथ रखे बैठा है।” नीरज और पास खिसका, हाथ जाँघ से पीठ तक सरका दिया — “देख रहा हूँ, सब याद कर लूँ… ताकि कल को भूल न जाऊँ कि ये बदन कितना प्यारा था।”
संजना उठी, धीरे से कपड़े पहनने लगी। नीरज ने पीछे से झुक कर उसकी कमर में होंठ रख दिए। “चलने से पहले थोड़ा और चख लूँ? कमर बोली, 'मुझे बिना चूमें ये कैसे चला जाएगा?'” संजना मुस्कराई — “तू न बस बहाना ढूँढता है छूने का।” “तो तू बदन नहीं है क्या? ट्रेन की याद बन गई है — जिसमें मैं हर स्टेशन पर हाथ फेरता चल रहा हूँ।” अब वो दरवाजे की तरफ बढ़ने लगे — धीरे-धीरे, शरीर तो चल रहा था, पर उंगलियाँ अब भी एक-दूसरे के गाल, गर्दन, उंगलियाँ और पीठ को छू रही थीं। दरवाज़ा खुला, संजना बाहर निकली — और जाते-जाते फुसफुसाई: “मैं चल रही हूँ, लेकिन मेरी खुशबू… तेरे तकिए में रह जाएगी।” नीरज बोला: “और मेरी उंगलियाँ… तेरे स्तनों की याद में हमेशा काँपती रहेंगी।” दरवाज़ा बंद हुआ। कमरे में ख़ामोशी रह गई — पर बिस्तर की चादर अब भी प्यार से भीगी थी।
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